बातों-बातों में:-
मकर संक्रांति और घुघुती माला
भगवत प्रसाद पाण्डेय
सौर मास में अब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य का मकर राशि में प्रविष्ट होना ही मकर संक्रांति कहलाता है। हमारे देश के प्रमुख पर्वों में यह एक है। विविधता भरे भारतवर्ष में इसे अलग-अलग नामों और तरीकों से मनाया जाता है। कहीं यह पोंगल है, कहीं तिल संक्रांति, कहीं मकर संक्रांति और कहीं उत्तरायणी। उत्तराखंड में इसे उत्तरेनी, घुघुतिया और पुशूड़िया भी कहा जाता है।
पहाड़ में इस पर्व को लेकर बड़ों से अधिक बच्चों में उत्साह होता है, क्योंकि इस दिन उनके गले में खास पकवानों से बनी “घुघुती माला” पहनाई जाती है। इस माला में आटे और गुड़ से बनी चिड़िया, ढाल, तलवार, डमरू, सूर्य, चाँद जैसी अनेक आकृतियाँ होती हैं। बच्चों की गर्दन में झूलती यह माला केवल मिठास का स्वाद ही नहीं, बल्कि एक पूरी लोककथा अपने भीतर समेटे रहती है।
यह लोक कथा कुछ इस तरह से है-
यह बहुत समय पहले की बात है। कुमाऊं में चंद वंश का एक राजा था। उसके पास धन-दौलत, महल, सेना सब कुछ था, परन्तु संतान नहीं थी। राजा दुःखी होकर अक्सर रानी से कहता—
“रानी! मेरे बाद राज्य का वारिस कौन होगा?”
रानी ढांढस बंधाती—
“महाराज! चिंता मत कीजिए, भगवान हमारी झोली भी भर देंगे।”
उधर मंत्री मन-ही-मन मुस्कुराता। "वाह! अगर राजा का बेटा नहीं हुआ, तो राज गद्दी मेरी ही होगी।”
एक बार राजा-रानी बागेश्वर गए। वहाँ सरयू नदी के तट से लगे बागनाथ मंदिर के दर्शन किये और पुत्र प्राप्ति की प्रार्थना की। कुछ समय बाद रानी ने एक सुंदर शिशु को जन्म दिया।
राजा-रानी दोनों खुश हुए। रानी बोली- "इसे हम घुघुती कह कर पुकारेंगे।”
रानी ने बालक घुघुती के गले में मोतियों की सुंदर माला पहना दी। घुघुती को वह इतनी पसंद आई कि वह किसी को छूने भी नहीं देता था।
जब घुघुती जिद करता तो रानी उसे समझाती—
“बेटा घुघुती! अच्छे बच्चे जिद नहीं करते। सुनो, हमारी बात नहीं मानोगे तो मैं यह माला कौवे को दे दूँगी।”
और फिर वह गुनगुनाती—
“काले कौवा काले काले,
घुघुती की माला खा ले।”
इतना सुनते ही कौवा सचमुच आँगन में आ बैठता। रानी उसे मीठे पकवान और दाना-पानी देती।
खाने के लालच से कौवा रोज़ आने लगा। अब तो घुघुती की उससे दोस्ती हो गई। वह खुद दाना लेकर कौवों को खिलाता और हँसते-खेलते उनके पीछे-पीछे भागता। इस तरह बाँकी कव्वे भी वहाँ भोजन की लालसा में आने लगे।
मंत्री हमेशा घुघुती को देख-देख कर जलता रहता। वह यही सोचता रहता कि अगर यह बच्चा जिंदा रहा, तो मैं कभी राजा नहीं बन पाऊँगा। इसे रास्ते से हटाना ही होगा।
एक दिन घुघुती खेलते-खेलते महल से बाहर निकल आया। मंत्री तुरंत उसके पास पहुँचा और बोला—
“आओ राजकुमार! मैं तुम्हें बाग-बगींचे की तरफ़ घुमाने ले चलता हूँ।”
भोला-भाला घुघुती उसके साथ हो लिया। मंत्री उसे जंगल की ओर ले जाने लगा। कौवों ने सब देख लिया। वे जोर-जोर से काँव-काँव करने लगे। घुघुती घबरा कर रोने लगा।
“माँ… माँ…!”
कौवों ने उड़ते-उड़ते एक-दूसरे को देख कर इशारों में योजना बनाई और मंत्री व उसके आदमियों पर झुंड बनाकर टूट पड़े।
“काँव… काँव… काँव…”
उन्होंने चोंच मार-मारकर सबको घायल कर दिया। अचानक हुए हमले से मंत्री और उसके साथी डरकर भाग गए।
बालक घुघुती पेड़ की छाँव में बहुत देर तक रोता रहा और फिर रोते-रोते वहीं पर सो गया। कुछ कौवे उसकी रखवाली करने लगे। कौवों के मुखिया ने धीरे से उसकी माला निकाली और माला चोंच में दबाकर सीधा महल की ओर उड़ चला।
महल पहुँचते ही कौवा जोर-जोर से काँव-काँव करने लगा और माला राजा के सामने गिरा दी।
राजा चौंका—
“यह तो घुघुती की माला है!”
रानी भी घबरा गई—
“महाराज! कहीं मेरे बेटे को कुछ तो नहीं हुआ?”
राजा ने रानी को सांत्वना दी और बोला—
“तुम निश्चिंत रहो। यह कौवा कुछ बताना चाहता है। मैं सैनिकों के साथ इस कौवे के पीछे-पीछे चलता हूँ।”
कौवा बार-बार उड़कर आगे-आगे जाने लगा। राजा और सैनिक उसके पीछे-पीछे जंगल पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि घुघुती घास पर मीठी नींद सो रहा है।
राजा की आँखें भर आईं। उसने अपने बेटे को गोद में उठाया और कौवों की तरफ़ देख कर कहा-
“धन्य हो कौवों! तुमने मेरे बेटे की रक्षा की।”
जब राजा घुघुती को लेकर राजमहल पहुँचा, तो रानी दौड़ती हुई बाहर आई और उसने बेटे को अपनी बाहों में भर लिया। उसका सिर सहलाते हुए बोली—
“घुघुती, आज तुम्हें इन कौवों ने बचाया है। यह माला ही तुम्हारी रक्षा बनी।”
उस शाम महल में बहुत से दीपक जलाए गए और तरह-तरह के मीठे पकवान बने। उनमें कुछ पकवानों को खिलौनों की आकृति देकर उनसे एक माला बनाई गई। अगले दिन मकर संक्रांति थी। रानी ने घुघुती को स्नान कराकर पकवानों की वह माला पहनाई। फिर कौवों को बुला-बुलाकर पकवान खिलाए।
बच्चे खुशी से गाने लगे—
"काले कव्वा काले,
घुघुती माला खाले"
“ले कौवा पुरी,
मुझे दे सोने की छूरी।
ले कौवा ढाल,
मुझे दे सोने का थाल।
ले कौवा तलवार,
मुझे दे सोने का हार।”
तभी से कुमाऊँ की पहाड़ियों में मकर संक्रांति के दिन बच्चों को पकवानों से बनी “घुघुती माला” पहनाने की परंपरा चली आ रही है। बच्चे उस माला से पकवान तोड़-तोड़कर कौवों को खिलाते हैं और आनंद से गाते हैं:-
"काले कव्वा काले,
घुघुती माला खाले"
“ले कौवा पुरी,
मुझे दे सोने की छूरी।
ले कौवा ढाल,
मुझे दे सोने का थाल।
ले कौवा तलवार,
मुझे दे सोने का हार।”
निवासी- पाटन पाटनी (लोहाघाट)
संपर्क 9458130723
© 2026. All Rights Reserved.