देवभूमि व्यंग्यबाण
नामी गिरामी कहे जाते हैं वे। कुछ कहते हैं उन्हें गिराने में महारथ है। प्रभु जाने, सच क्या है? मगर एक बात सच है। वे कभी किसी को नाराज नहीं करते। खासकर उसे, जो साधन, संसाधन और शक्ति से लैस हो। बल्कि ऐसी हर शख्सियत के वे मुरीद रहते हैं, बगैर ना-नुकूर किए। इस बार भी उन्होंने इसी हुनर को दिखाया और तारीफ में कसीद पढ़ दिए। या कहे कसीदे लिख दिए। जहां सवाल उठने-उठाने चाहिए थे, वहां सवाल के खुद जवाब लिख दिए। धन्य हो मूर्धन्य जी। आप महामना हैं! आपको शत-शत नमन।
तारीफ करनी क्यों पड़ी, इसे तो समझते हैं। एक वाकया गुजरे हफ्ते का है। एक कलमकार ने कलम और कैमरा चलाने की कोशिश की, जमीन में जो हो रहा, उसे लिखने-दिखाने की जुरुर्त कर डाली। फिर क्या था, वहीं हुआ, जो होना था! जिस चौखट पर अमूमन फरियादी को आप-बीती बताने और उसे लिखाने के लिए एड़िया रगड़नी होती है, वहां सब कुछ इतना तेजी से हुआ कि कोई भी एक्सप्रेस उस गति से नहीं दौड़ सकती। बिजली सी फुर्ती। बगैर आगा-पीछा देखे नंबर गेम में आगे होने की हसरत लिए लिखा-पढ़त हो गई। सब कुछ 24 घंटे में कागज में उतर गया। कई का कहना था कि डंडा अमूमन ऐसे ही चलता है। ऐसे ही चलना चाहिए।
क्यों जुर्रत की जमीन पर उतरने की? क्यों बताया कि जो गुलाबी कागज है और जमीन है दोनों का रंग एक सा नहीं है? बताते और दिखाते कि लोग आनंद में है, वक्त कैसे कटे, इसके लिए नए-नए प्रयोग कर रहे हैं! कोई और बहाना न मिला, तो इसी बहाने कतारबद्ध खड़े हैं, बतिया रहे हैं, गरिया रहे हैं। यूं भी कितनों की मजाल जो अपने दफ्तरों के गलियारे से झांक कर कह सके। लिख सके कि लोग कतार में भी हैं और इंतजार में भी, पर उसका नंबर आ ही नहीं रहा है। कई कलमकारों की स्याही तो चमकने और चमकाने में ही सूख रही है।
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