ललित मोहन गहतोड़ी
तेरी सुकली स्वामी मुखड़ि देखि, मि है गयूं लट्टू... ब्यूटिफुल तू।
कजरारे तिखा तिखा नैयनों ले, करि दीछी घायल तू... ब्यूटिफुल तू।
लाख देखनी छानि बानि, कोई त्वे है नै स्वानि।
चम चम चम चम चमकि तू रौछी, बात नै करनी कै दिनी, तेरा नाज नखरा देखनी।
घुमि फिरि बनि पागल लल्लू...ब्यूटिफुल तू।
कजरारे तिखा तिखा...जब तक तू नै साम्नै उनि।
मैं खन हुछि बेचैनी, चडफ़ड़ उडफ़ड़ लागी रूछी।
रात में ले आब नै सेइनी, मुखड़ा त देखा जा ऐलौनी।
तेरी लिजि बनि जानूं घर घोघ्घू...ब्यूटिफूल तू
कजरारे तिखा तिखा...।
इस गीत के लेखक काली कुमाऊं से प्रकाशित वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक 'फुहारें' के संपादक हैं। जो काली कुमाऊं लोहाघाट के चानमारी में निवास करते हैं। वे कई समाचार पत्रों में संवाददाता पद पर कार्य चुके हैं।
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