Tuesday Mar 17, 2026

व्यंग्यबाण

जनतंत्र में जन सर्वोपरि है। सियासत में भी जन के नाम पर ही हर सही-गलत काम किया जाता है। लेकिन कलमकारों के लिए जन का कितना मोल है, ऐसा कुछ हालिया खबरों से पता चलता है। जन से दूरी नए दौर के कलमकारों की खूबी बन गया है। उनकी ऐसी बेफिक्री उनकी ताकत बन गया है। उनका रसूख भी यहीं है कि वे सड़क से दूर रहें, समाज से कटे रहें, लोगों की तकलीफ में नमक छिड़कते रहे। उल्टा तकलीफ बताने वाले पर ही वे सवाल उठाते है, उन्हीं पर निशाना साधते हैं।

 

पिछले सप्ताह एक मुद्दा चारों तरफ चर्चा में था। जोरशोर से उठ रहा था। मुद्दा भी ऐसा कि एक मुल्क नहीं, तमाम मुमालिकों से उसका वास्ता था। कहें तो घर-घर से जुड़ा था। मसला ही ऐसा था कि लोगों की माथे की लकीरें गहरी हो रही थी, लाइनें लंबी थीं। लोग काम छोड़कर जा रहे थे और काफी लोग मायूस भी लौट रहे थे। कई मिस मैनेजमेंट भी थे। सबकी आंखें देख भी रही थी, कान सुन भी रहे थे, लेकिन हाथ कांप रहे थे।

कलमकारों का कमाल यह था कि सब कुछ देखते-जानते वे अबोध बनने  की अदाकारी कर रहे थे। इसकी तोड़ उन्होंने यह निकाली, जहां समस्या है, वहां न देखना ही समस्या का समाधान है। इस मंत्र का पालन उन्होंने शिद्दत से किया। जमीन में वे गए नहीं, ताकि जमीनी सच और लोगों की तकलीफ से सामना न हो जाए।

बस लिखने में मशगूल होने का स्वांग करते रहे। बंद आंखों से वे वो सब लिख रहे थे, जो उनसे बिना देखे लिखने को कहा जा रहा था। वैसे भी डिक्टेट होकर लिखने के लिए कौन सी आंखें चाहिए और कौन सी समझ। ऐसा करते-करते अब वे महारथी हो गए हैं! लोगों की परेशानी से बेफिक्र होना अब उनका हुनर बन चुका है। उनकी कलमकारी इस कदर कमाल कर रही थी कि वे कतार में लगे लोगों को ही इस ज्वलंत समस्या की जड़ बताने लगे। धन्य हैं, ऐसे कलकमार जो न समझ पाते हैं, न देख पाते हैं और न लिख पाते हैं। ऐसे प्रतापी और स्वनाम धन्य कलमकारों को उनके इस कमाल के लिए सलाम!




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