सामाजिक कार्यकर्ता दीप चंद्र पाठक ने नए नियमों को वापस लेने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री को भेजा पत्र
13 जनवरी से लागू UGC के नए नियमों को लेकर कई जगह हो रहा विरोध
सामाजिक तानेबाने और भविष्य को प्रभावित करने वाला बताया
देवभूमि टुडे
चंपावत/टनकपुर। इस साल 13 जनवरी से लागू UGC के नए नियमों को लेकर विरोध गहरा गया है। जिले के मैदानी क्षेत्र टनकपुर के सामाजिक कार्यकर्ता दीप चंद्र पाठक ने नए नियमों को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। कहा कि इससे न केवल शिक्षा की गुणवत्ता, बल्कि सामाजिक संतुलन भी बिगड़ने का खतरा है। ये नियम 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' की भावना के भी खिलाफ है। इस संबंध में उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र भेज नए विवादित नियमों को वापस लेने की मांग की है।
ज्वलंत मुद्दों में बढ़चढ़ कर आवाज उठाने वाले दीप चंद्र पाठक 2019 से 22 तक BJP के जिलाध्यक्ष और प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य रह चुके हैं। कहा कि नई पीढ़ी अमूमन जातिवाद से ऊपर उठकर समान शिक्षा चाहती है। शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि विभाजन पैदा करना। लेकिन ये नियम न सिर्फ अविश्वास पैदा करेंगे, बल्कि शिक्षा में समानता और योग्यता आधारित व्यवस्था की मूल भावना के भी विपरीत हैं। कानून को समावेशी होना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी को समान रूप से संरक्षण मिले। फिर कानून के लागू होने में यह भेदभाव क्यों? झूठे मामलों की स्थिति में क्या होगा?
सामाजिक तानेबाने और भविष्य को प्रभावित करने वाले UGC के नए नियमों पर जिले के वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के मौन पर निशाना साधा है। कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि ये नेता शिक्षा व समाज पर गहरा असर करने वाले मुद्दे को भी सियासत के नफे-नुकसान से तौल रहे हैं। कहा कि जनप्रतिनिधि मौन त्याग कर समाज और छात्रों के हित में साफ राय रखें।


Equity Cell की है अहम भूमिका
UGC के नए नियमों के मुताबिक, अब उच्च शिक्षा की सभी संस्थाओं में हर जगह एक Equity Cell बनाना ज़रूरी होगा। ये Cell एक तरह की अदालत जैसा काम करेगी। अगर किसी छात्र को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो वह यहां जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकेगी। कमेटी की सिफारिश पर संस्थान को उस पर तुरंत एक्शन लेना होगा।
उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव ख़त्म करने के लिए UGC ने अपने मौजूदा नियमों को और सख़्त किया है। 13 जनवरी को UGC ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनिमय 2026 जारी किया, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में समानता को बढ़ाना है ताकि किसी भी वर्ग के छात्र, छात्राओं के साथ भेदभाव को रोका जा सके। इसका उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, दिव्यांगता के आधार पर छात्र-छात्राओं से भेदभाव ना हो और विशेष रूप से SC, ST, OBC दिव्यांगों और इनमें से किसी भी वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव ख़त्म किया जा सके। इसके अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा दिया जा सके।
इसके मुताबिक़ जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव है। विवाद की मूल वजह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में OBC को शामिल करना है।
नोटिफ़िकेशन के मुताबिक़ उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए एक Equity Committee (समता समिति) बनाई जाएगी, जिसमें SC, ST, OBC, दिव्यांग व महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। ये समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी। लेकिन इस समिति में सामान्य वर्ग के लोगों के प्रतिनिधित्व की बात क्यों नहीं कही गई है?
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