गणतंत्र दिवस पर
जनकवि प्रकाश जोशी शूल
खुशहाल वतन हो अपना यही बस इच्छा है,
मालामाल वतन हो अपना यही बस इच्छा है।
सोना-चांदी उगले अपने देश की माटी,
प्रथम पूजित हों कृषक ऐसी बने परिपाटी।
भूखा रहे ना कोई प्यासा रहे ना कोई,
भरपूर फसल दे खेती जो भी किसान ने बोई।
टूटे-फूटे छप्पर बातें बनें अब कल की,
स्वच्छ-स्वस्थ शौचालय करें निकासी मल की।
बेटा-बेटी अन्तर ये भाव करें अब विस्मृत,
द्वेष जहर अब त्यागें बांटे प्रेम का अमृत।
विश्व गुरू हम बनकर ज्ञान का पुष्प खिलायें।
इस शूलमय जगत को हम प्रेम की राह दिखायें,
जगत-भाल वतन हो अपना यही बस इच्छा है।
खुशहाल वतन हो अपना यही बस इच्छा है,
मालामाल वतन हो अपना यही बस इच्छा है।
क्वेरालाघाटी, चम्पावत उत्तराखण्ड

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