बातों-बातों में:-
पंडित भगवत प्रसाद पाण्डेय
पर्व–उत्सवों से समृद्ध भारतीय संस्कृति में प्रतिदिन प्रायः कोई न कोई व्रत, पर्व या उत्सव मनाया जाता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि विद्या की देवी माँ सरस्वती के विशेष पूजन का पावन पर्व है। यही तिथि वसंत ऋतु के आगमन की उद्घोषणा भी करती है। भारतीय ऋतु-चक्र में वसंत के दो माह सर्वाधिक मनभावन माने गए हैं। वास्तव में वसंत पंचमी उल्लास, नवजीवन और सृजनशीलता से भरी प्रकृति का अनूठा उत्सव है।
भारतीय जनमानस में विद्या की देवी माँ सरस्वती की आराधना गहराई से रची-बसी है। माँ शारदा को विद्या, ज्ञान, बुद्धि और वाणी की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। मान्यता है कि समस्त प्राणियों में चेतना का संचार इन्हीं की कृपा से होता है, जिससे व्यक्ति की प्रतिभा विकसित होती है और वह विद्वता की ओर अग्रसर होता है। वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, व्यास जैसे महर्षि हों या महाकवि कालिदास और तुलसीदास, सभी की साधना और लेखनी में माँ सरस्वती के आशीर्वाद की झलक मिलती है।
पुराणों के अनुसार सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी ने अनुभव किया कि धरती पर मौन और शून्यता व्याप्त है। विष्णु जी के आह्वान पर आदि शक्ति से एक दिव्य तेजपुंज प्रकट हुआ, जिसके एक अंश ने सरस्वती का रूप धारण किया। दुर्गा सप्तशती और देवी भागवत में आद्या शक्ति के महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती तीन रूप बताए गए हैं, जिनमें सरस्वती को ज्ञान का स्वरूप माना गया है।
श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणा और पुस्तक धारण करने वाली, हंसवाहिनी माँ शारदा का स्मरण भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ माना जाता है। श्वेत वर्ण पवित्रता, सत्य, शुद्धता और ज्ञान का प्रतीक है, जबकि हंस विवेक और निर्मलता की पहचान कराता है। संगीत, साहित्य और कला को माँ सरस्वती से अलग नहीं किया जा सकता।
मान्यता है कि माँ सरस्वती का अविर्भाव माघ शुक्ल पंचमी को हुआ। इस समय प्रकृति पूर्ण श्रृंगार में होती है। वनस्पतियों में नई कोंपलें फूटती हैं, खेतों में सरसों के पीले फूल लहराते हैं, तितलियाँ मंडराती हैं, भंवरे गुनगुनाते हैं और कोयल की कूक वसंत के आगमन का संदेश देती है। यही कारण है कि वसंत पंचमी को ऋतुराज के स्वागत का पर्व माना गया है। यह दिन श्रीकृष्ण और राधा के मिलन से भी जोड़ा जाता है, इसलिए इसे श्री पंचमी कहते है। इसे विद्या जयंती और बागेश्वरी जयंती भी कहा जाता है। प्राचीन काल में इस अवसर पर मदनोत्सव मनाने की परंपरा भी रही है। इसी दिन छोटे बच्चों का विद्यारंभ संस्कार किया जाता है।
उत्तराखंड में वसंत पंचमी का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। पर्वतीय क्षेत्रों में पुरोहित अपने यजमानों के घर जाकर जौ की हरी पत्तियाँ प्रदान करते हैं, जिन्हें माँ सरस्वती के आशीर्वाद के रूप में सिर या कान में धारण किया जाता है। खेतों में सरसों के पीले फूल, प्योली के पुष्प, बच्चों के वस्त्रों में हल्दी से रंगे रुमाल, महिलाओं का पीत वस्त्र धारण करना यह सब वसंत के उल्लास को प्रकट करते हैं। इस दिन बच्चों द्वारा पतंग उड़ाना, कन्याओं के नाक-कान छेदन की परंपरा, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत संस्कार, नए भवनों की नींव और तीर्थों में स्नान-दान की परंपरा भी प्रचलित है।
समय के साथ शिक्षा और समाज में व्यापक परिवर्तन आए हैं। कभी गुरुकुलों में विद्या-दान की समृद्ध परंपरा थी, जहाँ गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत वार्षिक सरस्वती पूजन होता था। आज शिक्षा संस्थान व्यवसायिक स्वरूप लेते जा रहे हैं। ऑनलाइन शिक्षा, तकनीकी माध्यम और बाजारीकरण ने पर्व-उत्सवों की आत्मीयता को प्रभावित किया है। बच्चों में पतंग उड़ाने का उत्साह कम हुआ है और सरस्वती पूजन के प्रति आस्था भी कुछ हद तक क्षीण होती दिखाई देती है।
फिर भी, यदि हम अपने कर्मक्षेत्र में निष्ठा से साधना करें, बुद्धि और विवेक का संतुलित प्रयोग करें, तो जीवन में सुख, शांति और समृद्धि संभव है। कहा गया है कि सरस्वती का वास प्रत्येक व्यक्ति की वाणी में होता है। आवश्यकता है कि हम अपनी वाणी को संयमित, मधुर और सकारात्मक बनाएं। वसंत पंचमी के पावन अवसर पर वाणी-संयम और सद्बुद्धि का संकल्प लेना ही सच्चे अर्थों में माँ सरस्वती की आराधना है।
(लेखक साहित्यकार और सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)
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