बातों-बातों में:-
इन पच्चीस वर्षों में देश और दुनिया कितनी बदल गई
भगवत प्रसाद पाण्डेय
अभी-अभी तो कैलेंडर के पन्नों पर इक्कीसवीं सदी की शुरुआत हुई थी। याद आती है 1 जनवरी 2001 की वह सुबह, जब अख़बारों में “नई सदी” बड़े-बड़े अक्षरों में छपा था। तब शायद किसी ने सोचा भी न होगा कि देखते-देखते इस सदी के पच्चीस साल हथेली से रेत की तरह फिसल जाएँगे। आज जब 2025 विदाई लेने को है, तो लगता है कि ये 25 साल किसी स्टेशन पर रुके ही नहीं। वे तो चलती ट्रेन की तरह थे, जिसमें बैठकर हम बस खिड़की से बाहर झाँकते हुए ज़िंदगी देखते रहे।
इन पच्चीस वर्षों में देश और दुनिया कितनी बदल गई! इसका अंदाज़ा इसी सफ़र से लगाया जा सकता है। जिन बच्चों ने 2000 के आसपास आँखें खोली थीं, वे आज नौकरी, परिवार और ज़िम्मेदारियों की कतार में खड़े हैं। जो तब युवा थे, वे अधेड़पन की दहलीज़ पर पहुँच चुके हैं और कई तो उस दौर की कहानियाँ सुनाते हुए अपने पोते-पोतियों को गोद में खिला रहे हैं।
इस सदी की चवन्नी बीत गई। इन वर्षों में बदलाव सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं रहा। रिश्तों की भाषा बदली, परिभाषाएँ बदलीं, बातचीत के तरीके बदले।
हमने बहुत कुछ पाया—सुविधाएँ, रफ़्तार, जानकारी—और बहुत कुछ खोया भी—फुर्सत, धैर्य और वह सामाजिक ताना-बाना, जिसमें लोग एक-दूसरे के लिए समय निकालते थे। इन वर्षों ने बार-बार याद दिलाया कि जीवन केवल उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं है। किसी का बचपन पीछे छूट गया, कोई जवानी से सीधे ज़िम्मेदारियों के भारी बस्ते तक पहुँच गया, तो कोई अपनों को खोकर अचानक बड़ा हो गया। कहीं सपने पूरे हुए, कहीं टूटे और कहीं बस अधूरे रह गए। हर साल हमें कुछ देकर गया—कभी सीख, कभी अनुभव, कभी मुस्कान और कभी किसी की कमी का स्थायी खालीपन।
अब यह सन 2025 ईस्वी भी अपनी गठरी समेट रहा है। यह साल भी हमसे बिना पूछे चला जाएगा, पर जाते-जाते हमारे हिस्से में बहुत-सी यादें, कुछ पछतावे और ढेर सारी कहानियाँ छोड़ जाएगा। सामने 2026 खड़ा है। बिल्कुल एक कोरे काग़ज़ की कॉपी की तरह। इसके पन्ने भी फटाफट पलटेंगे। अभी न कोई वाक्य लिखा है, न कोई शीर्षक। नया साल हमसे कुछ कहता नहीं, बस चुपचाप पूछता है—
“इस बार क्या लिखोगे?”
इसलिए कहा जाता है कि समय रुकता नहीं। हाँ, हम रुक सकते हैं—दो पल ठहरकर पीछे देखने के लिए और फिर आगे बढ़ने के लिए। याद करें कि पिछली 31 दिसम्बर की रात हमने क्या वादे किए थे, क्या सपने बुने थे और उनमें से कितनों को पूरा कर पाए। आने वाले साल में समय को कोसने के बजाय हर उस क्षण के लिए आभार रखें, जो हमें मिला है। क्योंकि घड़ी की सुइयाँ चाहे जितनी तेज़ दौड़ें, हमारी यादों में वही पल सबसे ज़्यादा ठहरते हैं, जिन्हें हमने पूरे मन से जिया होता है। यही नए साल का सबसे बड़ा संकल्प हो—समय के पीछे भागना नहीं, बल्कि उसे महसूस करते हुए अपने इरादों को पूरा करना।
(लेखक साहित्यकार और सेवानिवृत्त अधिकारी है।)
संपर्क 9458130723
© 2026. All Rights Reserved.