Wednesday Feb 4, 2026

जिनके नाम पर बना मीना बाज़ार

बातों-बातों में :

भगवत प्रसाद पाण्डेय

लोहाघाट की मीना बाज़ार 18 दिसंबर से ‘वन-वे’ ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर चर्चा में है। लोग 'बातों-बातों में' मीना बाज़ार का नाम ले रहे हैं। यह अलग बात है कि लोहाघाट की नई पीढ़ी शायद यह न जानती हो कि इस बाज़ार का नाम ‘मीना बाज़ार’ क्यों पड़ा। आइए, इसे सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं। 

 

ब्रिटिश शासनकाल में सन् 1839-40 के आसपास लोहाघाट के प्राकृतिक सौंदर्य और स्वास्थ्यवर्धक जलवायु से प्रभावित होकर अंग्रेज़ शासकों ने फर्नहिल, ज्योड़ियां, एबटमाउंट और लोहाघाट को आवासीय प्रयोजन के लिए चुना। देवदार के घने वनों से घिरी लोहाघाट की भूमि चाय बाग़ान के लिए मिस्टर हैंसी को ‘फ्री सैम्पल एस्टेट’ के रूप में दी गई। बाद में यह ज़मीन मिस्टर टलक ब्रे के पास आ गई और यह क्षेत्र ‘टलक ब्रे एस्टेट’ कहलाया। इसी दौरान यहाँ एक सैन्य छावनी भी बनाई गई। वर्तमान राजकीय चिकित्सालय के आसपास बैरकें बनीं और पाटन-पाटनी के चाँदमारी क्षेत्र में सैन्य अभ्यास होते थे। कर्नल रैक के एक अधिकारी का आवास आज के उप जिलाधिकारी आवास वाला शानदार भवन था। तहसील भवन के पास घोड़ों के अस्तबल के अवशेष कुछ वर्ष पूर्व तक मौजूद थे। अमला क्वार्टर में अंग्रेज़ अफ़सरों का स्टाफ रहता था। लोहाघाट कस्बे में अंग्रेज़ों के कई बंगले थे, जिनमें से अधिकांश नष्ट होकर नए रूप में बदल गए हैं।  हालांकि कुछ भवन स्वामियों ने उन्हें अब भी उसी मूल स्वरूप में सहेज रखा है। इन्हीं भवनों में एक विशेष बंगला था, जहाँ मीना मैकडोनाल्ड रहती थीं।

लोग स्नेह से उन्हें “मीना दीदी” कहते थे। अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद यहाँ मीना दीदी और उनके भाई टिक्का साहब ही रह गए। टलक ब्रे के बाद मीना मैकडोनाल्ड के पास टलक ब्रे एस्टेट की ज़मीन की पावर ऑफ़ अटॉर्नी थी। जिसके आधार पर उन्होंने 1985 तक काफ़ी ज़मीन बेची। बाद में पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी बिजेन्द्र पाल ने इस भूमि की ख़रीद-फरोख़्त पर रोक लगा दी। इसके बावजूद लोग “मीना दीदी-मीना दीदी” कहते हुए उनसे अनुनय-विनय कर ‘घर-स्टाम्प’ की ज़मीन लेते रहे। धीरे-धीरे वहाँ एक छोटा-सा बाज़ार विकसित हो गया, जो आगे चलकर मीना दीदी के नाम पर ही ‘मीना बाज़ार’ कहलाया। वर्ष 1992 में मीना मैकडोनाल्ड का निधन हो गया। हर क्रिसमस डे को मीना दीदी के उस बंगले में हमेशा बड़ी भीड़ रहती थी। लोग उन्हें बधाई देने जाते थे और बदले में वे सबको दावत देती थीं, केक खिलाती थीं और छोटे बच्चों को उपहार देती थीं।

(लेखक साहित्यकार एवं राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)




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