■भगवत प्रसाद पाण्डेय
पहाड़ के उस गाँव में परंपराएँ इतनी मज़बूत हैं कि वहाँ हवा भी सोच-समझकर बहती है। औरतें आज भी अपने पति का नाम लेने में सकुचाती हैं। गाँव वालों को भी सख़्त निर्देश हैं कि प्रधान जी की पत्नी का नाम कोई नहीं लेगा। उन्हें सिर्फ़ “बीबी जी” कहा जाएगा। हाँ, प्रधान राम दत्त जी को लोग आदर से “राम जी” कहते थे।
गुनगुनी धूप में उस दिन पंचायत घर में चौपाल जमी थी। कोई पहाड़ में इन दिनों हो रहे गुलदार के हमलों से सहमा बैठा था। जल जीवन मिशन योजना में पानी से ज़्यादा काग़ज़ बहने की बात भी वहाँ हो रही थी। कुछ लोग जंगली जानवरों से उजड़ती जा रही खेती का रोना रो रहे थे। उनके गाँव के सरकारी स्कूल में मास्टरों की कमी की चर्चा भी चल रही थी। राज्य में चल रहे ‘जन-जन की सरकार जन-जन के द्वार’ कार्यक्रम में आने वाली शिकायतों जैसी गाँव में भी ढेरों समस्याएँ मौजूद थीं—बस समाधान वाली बात हमेशा की तरह इंतज़ार ही करती थीं।
इसी बीच धरमा यानी धर्म सिंह भी आ धमके। अभी बैठे भी नहीं थे कि उनके मुँह से निकल गया—
“बीबी जी राम जी…”
बस फिर क्या था! चौपाल में ऐसा सन्नाटा छाया, जैसे किसी ने परंपरा की नस दबा दी हो। प्रधान राम दत्त जी ने आँखें तरेरते हुए कहा—
“धरमा, ये कैसा उच्चारण है? गाँव के नियम भूल गए?”
धरमा ने मासूमियत की चादर ओढ़ ली—"प्रधान जी, नियम नहीं तोड़े, बस सम्मान बढ़ाया है। हमारे लिए आप भी बड़े, बीबी जी भी बड़ी, तो दोनों को जोड़कर कह दिया।”
बातों-बातों में एक बुज़ुर्ग बीच में कूद पड़े—“अरे धरमा, ऐसे जोड़-तोड़ करोगे तो लोग काम भी माँगने लगेंगे।”
धरमा हँस पड़ा— “माँगेंगे ही! काम तो वैसे भी बीबी जी की कृपा से अधिक होते हैं।
राम जी का आशीर्वाद ऊपर से बोनस है। इसलिए सरकार ने भी अब सीधा-साफ़ नाम रख दिया है।
‘बीबी जी राम जी योजना।’
काम चाहिए? तो इसी योजना में तुरंत काम मिलेगा!”
(लेखक साहित्यकार और राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)
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