बातों-बातों में (विचार प्रवाह)
लोहाघाट वन-वे ट्रैफिक
भगवत प्रसाद पांडेय
जब चम्पावत के DM विनीत तोमर जी थे, तब एक दिन मैंने उनसे लोहाघाट में वन-वे ट्रैफिक लागू करने का अनुरोध किया था। उन्होंने अपने बगल में बैठे SP साहब से बात की। SP साहब का कहा-" बात सही है। वहाँ बहुत जाम लगता है। इस समय फ़ोर्स कम है, फ़ोर्स वापस आते ही इस पर अमल करेंगे।” उद्देश्य बिल्कुल साफ़ था—नगर को रोज़-रोज़ के जाम के झाम से राहत दिलाना।
इसी के कुछ माह बाद लोहाघाट में के.एन. गोस्वामी जी एसडीएम बनकर आए। उन्होंने डीडीहाट में रहते हुए वहाँ वन-वे ट्रैफिक व्यवस्था सफलतापूर्वक लागू की थी। पिथौरागढ़ से ही उनसे मेरा परिचय था, इसलिए एक दिन चम्पावत कलेक्ट्रेट में इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई। अगले ही दिन उन्हें लोहाघाट नगर के लिए एक व्यावहारिक वन-वे यातायात का नक्शा बनाकर मैंने दे दिया। इसमें सुझाया गया—लोहाघाट स्टेशन–डाकबंगला रोड, डिग्री कॉलेज तिराहा, मीनाबाजार, हथरंगिया होते हुए जयंती भवन वाला रूट। उन्होंने
स्वयं मौके पर जाकर स्थिति देखी और व्यवस्था लागू कर दी। शुरू-शुरू में लोगों को यह कुछ अटपटा ज़रूर लगा, पर थोड़े ही समय में अधिकांश लोग इसके लाभ समझने लगे और सहमत भी हो गए। दुर्भाग्य से यह व्यवस्था एसडीएम साहब के अल्प कार्यकाल तक ही सीमित रही। उनके स्थानांतरण के साथ ही वन-वे व्यवस्था चरमरा गई।
एक बार फिर जाम से परेशान जनता के अनुरोध पर एसपी साहब द्वारा मीनाबाजार से जयंती भवन तक वन-वे व्यवस्था को प्रायोगिक रूप में लागू किए जाने की खबर मिली है। यह संभव है कि कुछ लोग इसका समर्थन तो कुछ विरोध भी दर्ज कर सकते हैं। सवाल यह है कि यदि उद्देश्य वास्तव में नगर को जाम से राहत, वाहन दुर्घटनाओं में कमी और पैदल चल रहे लोगों को सुविधा दिलाना है, तो करीब पाँच साल पहले सफलतापूर्वक लागू की गई संपूर्ण वन-वे व्यवस्था का समर्थन कर उसे पुनः लागू करवाना चाहिए।
पैतृक जनपद मुख्यालय पिथौरागढ़ में वर्षों से वन-वे व्यवस्था निर्बाध चल रही है। पड़ोसी जनपद मुख्यालय अल्मोड़ा में है, अन्य शहरों में भी है। तो फिर हम लोहाघाट के निवासी थोड़ा-सा घूमकर आने-जाने में इतनी परेशानी क्यों महसूस करते हैं? विडंबना यह है कि जाम की असली पीड़ा तब याद आती है, जब कोई बेहद जरूरी काम पड़ जाता है। उस समय अनायास ही मन से आवाज़ निकलती है—“यार! लूघाट में वन-वे ज़रूरी है गो।”
शायद अब जरूरत इस बात की है कि हम असुविधा के डर से नहीं, सुविधा के दीर्घकालिक लाभ को समझकर निर्णय लें—ताकि लोहाघाट जाम के लिए नहीं, सुगम यातायात के लिए पहचाना जाए।
(लेखक साहित्यकार और राजस्व विभाग सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)
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