Wednesday Jul 29, 2026

नेपाल सीमा से लगे बिल्दे गांव के ज्वाला मंदिर में आस्था का महाकुंभ

देवलिया वंश के पांडेय परिवार की इष्ट कुलदेवी मां ज्वाला देवी के नव-निर्मित मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा पर पांडेय परिवार की 7 पीढ़ियों के लोग एक साथ गांव पहुंचे

कांगड़ा से लाकर की गई नव निर्मित मंदिर में मां ज्वाला देवी की प्राण-प्रतिष्ठा

देवभूमि टुडे

चंपावत/ गुमदेश। भारत-नेपाल सीमा से लगे गुमदेश क्षेत्र का बिल्दे गांव इन दिनों चर्चा में है। आस्था, संस्कृति और  5 दिनी धार्मिक महायज्ञ के साथ ही यह गांव पारिवारिक एकता और सामूहिक बोध का भी गवाह बना है। देवलिया वंश के पांडेय परिवार की इष्ट कुलदेवी मां ज्वाला देवी के नव-निर्मित मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर देशभर में बसे पांडेय परिवार की  7 पीढ़ियों के सदस्य एक साथ गांव पहुंचे। इनमें मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, भोपाल, अहमदाबाद, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद सहित उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों से पांडेय परिवार के श्रद्धालु यहां पहुंचे हैं। परिवार के साथ यहां अनुष्ठान में भाग लेकर उन्होंने कुलदेवी का आशीर्वाद लिया।

 

बिल्दे गांव में आयोजित महायज्ञ के दौरान यज्ञ में आहुतियां देते श्रद्धालु।

आयोजन की सबसे खास बात यह है कि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित विख्यात मां ज्वाला देवी धाम से अखंड ज्योति विशेष रूप से बिल्दे गांव लाई गई।  जिसके सानिध्य में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर में विधि-विधान से प्राण-प्रतिष्ठा हुई। महायज्ञ में सुख-शांति, जगत कल्याण और क्षेत्र की खुशहाली के लिए भी आहुतियां दी गईं। बताते हैं कि सपने में देवलिया पांडेय समाज के प्रमुखों को एक साथ अपनी कुलदेवी का मंदिर बनाने की प्रेरणा मिली। इसके बाद परिवार के सभी सदस्यों ने एकजुट होकर इस संकल्प को साकार किया और अब यह मंदिर क्षेत्र में आस्था का नया केंद्र बन गया है। इस आयोजन ने वर्षों पहले गांव से पलायन कर चुके लोगों को भी अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखने में मदद की। और अब नई पीढ़ी ने भी इस कुल परंपराओं और धार्मिक संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने का भी दे रहे संदेश:

बिल्दे गांव में पांडेय परिवार की आस्था, अनुशासन एवं सामूहिक सहभागिता की गुमदेश क्षेत्र में खूब चर्चा हो रही है, साथ ही तारीफ भी खूब हो रही है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद पांडेय परिवार के सदस्यों ने निर्णय लिया कि भविष्य में बच्चों के जनेऊ संस्कार सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी मंदिर परिसर में सादगी और मितव्ययता से कराए जाएंगे। इस कदम से समाज में फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने का संदेश भी जाएगा।




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