वाह रे सिस्टम-1
15 मिनट में प्रमाणपत्र बन गया। ऐसा कैसे हो गया? क्या रामराज्य आ गया? चौकते हुए पूछा। नहीं-नहीं राज्य तो राम का नहीं है। रामधाम में क्या हो रहा है, देख लो पता चल जाएगा कि राज किसका है? जिसका भी हो राज्य न तो राम का है नहीं श्याम का। तो फिर ये चमत्कार कैसे हुआ? पूछने वाले ने उत्सुकता से फिर सवाल दागा। तो सुनिए कैसे हुआ ये चमत्कार।
महीना फरवरी का था। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने एक प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया। सामाजिक कार्यकर्ता सिफारिश से दूर कायदे-कानून को मानने वाले थे। दक्षिणा वे देते नहीं थे, जल्दी उन्हें थी नहीं। 4 महीने बाद सामाजिक कार्यकर्ता, जो राज्य आंदोलनकारी भी हैं, चंपावत जिले के उस कार्यालय गए। दफ्तर में फाइल की तलाश हुई। बहुत खोजबीन के बाद भी फाइल नहीं मिली। पटल बाबू के पसीने छूट गए। दुबारा फाइल तैयार करने के लिए कहा गया। आंदोलनकारी भड़क गए। उन्होंने इंकार कर दिया। मामले को मुखिया के चौखट तक ले जाने की बात कही, तो अमला हिल गया। बाबू ने बात कार्यालय प्रमुख तक पहुंचार्ई। उन्होंने मातहत को फटकार लगाई। फिर आननफानन में 15 मिनट में बगैर किसी कागज के प्रमाणपत्र बन गया। सब अचंभित। जो काम सारी कार्यवाही के बाद 4 माह के बाद भी नहीं हुआ, वह चुटकियों में हो गया। धन्य है सिस्टम।
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