वंचित राज्य आंदोलनकारी संगठन के जिलाध्यक्ष एवं पत्रकार दिनेश पांडेय ने राज्य स्थापना दिवस से पूर्व प्रदेश में आवदेन करने वाले तमाम लोगों को राज्य आंदोलनकारी का दर्जा नहीं मिलने पर दी आंदोलन की चेतावनी
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष कुंवर के सम्मुख उठाई आवाज, कहा-पेंशन नहीं प्रमाणपत्र चाहिए
देवभूमि टुडे
चंपावत। उत्तराखंड राज्य की लड़ाई सूबे के तबके हर व्यक्ति ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लड़ी है। उस आंदोलन में आंदोलन की भावना के साथ हर नागरिक जुड़ा हुआ था। लेकिन चिन्हिकरण के लिए निर्धारित किए गए कायदे-कानूनों की पेंचीदगियां पूरी नहीं करने की वजह से कुछ ही लोगों को राज्य आंदोलनकारी का दर्जा मिला। और तो और राज्य निर्माण के तकरीबन 26 साल पूरे होने पर भी आंदोलनकारी की चयन प्रक्रिया को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। ऐसे में आंदोलनकारियों के लंबित आवेदनों को राज्य स्थापना की 26वीं वर्षगांठ (9 नवंबर) से पूर्व निस्तारित किया जाना चाहिए। और आवेदन करने वाले सभी आवेदकों को सम्मान की इस लड़ाई में इंसाफ मिलना चाहिए। उन्हें पेंशन नहीं चाहिए, सम्मान के रूप में प्रमाणपत्र चाहिए। ये तमाम बातें कहनी है वंचित राज्य आंदोलनकारी संगठन के जिलाध्यक्ष और पीटीआई के पत्रकार दिनेश चंद्र पांडेय का।

इसे लेकर 24 सितंबर को उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष कुंवर के सम्मुख आवाज उठाई। उन्हें ज्ञापन दे पत्रकार पांडेय ने कहा कि राज्य की लड़ाई के साथ ही उस वक्त उत्तराखंड में आरक्षण विरोधी आंदोलन, चंपावत, बागेश्वर व रुद्रप्रया तीन जिलों के गठन का भी आंदोलन चल रहा था। जिस कारण कई जगह चिन्हिकरण में विसंगतियां भी हुई। राज्य की लड़ाई लड़ रहे कुछ लोगों को आरक्षण विरोधी और जिला गठन से जोड़ दिया गया। जिस कारण कई वास्तविक आंदोलनकारी चिन्हीकरण से वंचित रह गए। जबकि उसके उलट राज्य आंदोलन का विरोध करने वाले कई लोग राज्य आंदोलनकारी के रूप में चिन्हित हो गए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कई थानों में उस वक्त के दस्तावेज नहीं होने से भी आंदोलन के दौरान मिले पुलिस के प्रमाण पत्रों का सत्यापन नहीं हो पा रहा है। और तमाम मामले लटके हैं। जिससे अनेकों वास्तविक आंदोलनकारी में निराशा है।
पांडेय ने कहा कि अगस्त 2010 में चंपावत के तत्कालीन डीएम एएस नयाल ने 12 पत्रकारों को राज्य आंदोलनकारी का दर्जा देने की संस्तुति करते हुए शासन को पत्र भी भेजा था। फिर भी मामला लटका हुआ है। उन्होंने कहा कि आवेदन की निर्धारित तिथि तक प्रदेश के तमाम जिलों में प्रत्यावेदन देने वाले सभी लोगों को राज्य आंदोलनकारी चिन्हित करने की शासन ने राजाज्ञा जारी करनी चाहिए। वंचितों का यह कहना है कि उन्हें पेंशन नहीं, बल्कि राज्य की लड़ाई का प्रमाणपत्र चाहिए क्योंकि उन्होंने राज्य के लिए संघर्ष किया है। राज्य स्थापना दिवस से पूर्व राज्य आंदोलनकारी घोषित नहीं किए जाने पर प्रदेश भर के वंचित राज्य आंदोलनकारी सड़कों पर उतरकर अपने हक की लड़ाई लड़ेंगे।
अध्यक्ष हुकुम सिंह कुंवर ने वंचितों को भरोसा दिलाया कि वे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने इस मसले पर एक ड्राफ्ट रखेंगे और राज्य स्थापना दिवस से पूर्व कुछ न कुछ सार्थक हल निकलने का उन्होंने भरोसा दिलाया। शिष्टमंडल में वंचित राज्य आंदोलनकारी शेखर खोलिया, अशोक जोशी सहित कई लोग मौजूद थे।
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