हो जिस दिन अबीरी मुस्कान अधरों पर,
हो जिस दिन गुलाबी झंकार स्वरों पर।
दृष्टि अपनत्व की हो जिस दिन गैरों पर,
रंग खुशहाली के जिस दिन बरसें घरों पर।
उसी दिन समझो आई होली है।
जिस दिन जन-जन खेलें प्रेम-स्नेह की होली,
सीमाओं पर जिस दिन दुश्मन की शांत हो गोली,
जिस दिन सभी जन धारें निज मस्तक विश्व बंधुत्व की रोली।
विश्व शांति बन जायेगी जिस दिन जन-जन की बोली,
उसी दिन समझो आई होली है।
जिस दिन दुश्मन भी दुश्मन के गले मिले,
जिस दिन तीक्ष्ण शूल में भी सुकोमल फूल खिले।
ना रहें जिस दिन कोई भी शिकवे गिले,
जिस दिन सकल अंतस बन जायें प्रेम किले।
उसी दिन समझो आई होली है।
जनकवि शूल क्वेरालाघाटी, चम्पावत उत्तराखण्ड
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