प्रकाश जोशी शूल*
वनों को नष्ट होने से आओ! बचायें हम।
जीवों को कष्ट होने से,
आओ! बचायें हम।
पर्यावरण शुद्ध हो इसके लिए आओ!
एक-एक पौध अपनी ओर से, आओ! लगायें हम।
कुछ विद्वान हैं जग में जो बाग लगाते हैं।
कुछ नादान ऐसे हैं जो आग लगाते हैं।
आग वन उपवन में लगाना जुर्म है सुन लो।
हर एक बाग में कुआं आओ! खुदायें हम।
प्रदूषित हो रहा है जल, हवा भी हो रही दूषित।
पॉलीथिन पन्नियों से आज धरा हो रही दूषित।
निज धरा को स्वच्छ रखना है अगर हमको, लिफाफे कागजों के आज से ही, आओ! बनायें हम।
*कवि द्वारा 1991 से नशामुक्ति एवं स्वच्छ पर्यावरण हेतु जन जागरूकता अभियान-नशामुक्त परिवेश एवं स्वच्छ पर्यावरण-अभियान चलाया जा रहा है।
कवि द्वारा आइए! आग नहीं बाग लगायें---स्लोगन के साथ वर्ष 2011 से वनों को आग एवं जंगल माफियाओं से बचाने हेतु जन जागरूकता अभियान---जंगल है (तो) मंगल है। चलाया जा रहा है।
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