मीडिया मर्म-1
CUT नहीं अब सिर्फ COPY व PASTE
मीडिया कर्मियों और गिरगिट में कौन ज्यादा जल्दी रंग बदलने में माहिर है? रंग बदलने के कलाकारों की ये तुलना यूं ही नहीं है। कभी अराजक का तमगा, तो कभी भ्रामक जानकारी प्रसारित करने के सिद्धहस्त अब मौके पर चौका मारने में भी मास्टर हो गए हैं।
कल ही एक खबर पढ़ी। नाम के बाद 'जी' और पदनाम से पहले 'माननीय' लिखा मिला।
सरनेम के बाद 'जी' लिखना उनकी आदत में शुमार है। इसलिए नहीं कि वे सम्मान दे रहे हो, बल्कि इसलिए कि वे CUT, COPY, PASTE के दौर में CUT करने में वक्त गंवाना नहीं चाहते। जो मिला, जैसा मिला, उसे PASTE कर दिया। सिर्फ 'जी' नहीं लगा रहे हैं, बल्कि जी हुजूरी में भी उस्ताद हैं ये महाशय। एकाध हो तो कोई बात नहीं, लेकिन जब कुएं में ही भांग पड़ी हो, तो क्या हो?
ऐसे रंगढंग खास जिले में अब आम हैं। आदर्श की लंबी फेहरिस्त के बीच ये भी एक नायाब मॉडल है। इसमें कोई एक किसी का रोल मॉडल नहीं, सब एक से बढ़कर एक। कौन किस पर भारी? कौन किससे कितना आगे? कौन कितनी गहरे पानी में? ऐसे सवालों का मुकम्मल जवाब भले ही कभी न मिला हो, लेकिन एक बात जरूर सच है कि कोई किसी से कम नहीं। क्या पढ़ाएं, क्या दिखाएं, क्या सुनाएं? इसकी कोई न्यूनतम मर्यादा है कि नहीं? इसकी कोई संहिता है कि नहीं? एथिक्स की तो बात ही क्या की जाए?
मॉडल दौर का मॉर्डन दस्तूर शायद यही है कि पेशेगत न्यूनतम मर्यादाएं तार-तार हो जाएं! किसी को 'जी' से नवाजें, तो किसी को माननीय मानें। धन्य हो कलम के कारिंदो! ये सम्मान उन महाशयों का नहीं है, जिन्हें, मीडिया 'जी' या 'माननीय' से नवाज रहा है, बल्कि जी हुजूरी और विवेक शून्यता का प्रमाण है। मुमकिन है कि खुशामदवीर के तमगे से उनका कुछ उल्लू सध जाए, लेकिन मान की हानि और मर्यादा का हनन वे सिर्फ अपनी नहीं अपनी समूची कम्युनिटी के कर रहे हैं।
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