मीडिया का आयना
आज ईद-उल-अजहा है। सभी को मुबारकवाद। वहीं हिंदी पत्रकारिता को भी 2 दिन बाद 200 साल हो जाएंगे। इस मौके पर मीडिया के हाल पर एक नजर। देश-प्रदेश की हिंदी मीडिया तो लगातार सुर्खियों में है ही, इसलिए बात उसकी न कर अपने ही जिले की की जाए। जिला बड़ा नहीं है न आबादी में न क्षेत्रफल में, मगर कई कारणों से यह छोटा जिला बड़ा भी है और खास भी। यहां क्या छप रहा है, क्या छुप रहा है, कैसे छप रहा है? क्या जो लिखा या दिखाया जा रहा है, उससे दूध का दूध पानी का पानी हो रहा है? आज बात इसी पर।
बात कल ही की तो है। एक मुलाजिम इधर से उधर हुए। वास्ता कागज-कलम वालों से था, तो जाहिर है उस बिरादरी के काफी लोग सहभागी भी थे। कार्यक्रम दिन के 2 बजे निपटा। मगर अगले दिन सूचना गायब। खबर छापता है छुपाता नहीं है की लाइन लेने वालों से लेकर अलग-अलग लाइन-लेंग्थ वाले मुख्य धारा ने सिर्फ छुपाने का काम किया।
मामला महज इस एक मामले का नहीं है। आज ही मुख्य धाराओं ने एक फैसला छापा है। पूरे 2 दिन देरी से। 26, 27 को सभी मुख्यधारा ने अनदेखी की और जब छपा तो सबमें एक साथ और कमोबेश एक जैसा भी। क्या गजब है, कैसा अजब संयोग है!
अभी 2 दिन पहले ही जेल-बेल के मामले में भी कलम ने कमाल किया। 1 को छोड़ बाकियों ने अंधेरे में तीर चलाया। यानी आधा सच- आधा झूठ। ये महज 2-3 दिन की बानगीभर है। छपेगा तो सबमें और छुपेगा तो सबमें। फिक्सिंग खेलों में ही नहीं है पत्रकारिता से खिलवाड़ करने वाले भी कम नहीं कर रहे हैं! तो ऐसे में हिंदी क्षेत्रों में हिंदी पत्रकारिता से क्या कोई आस बचती भी है? उत्तर सब जानते हैं, लिखने वाले भी और पढ़ने वाले भी!
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