ललित मोहन गहतोड़ी
अच्हारे हर एक बेवस को, ठगो नहीं रे ठगव्वा लोग...
हर एक बेवस को, ठगो नहीं रे ठगव्वा लोग...
सबको ठग ठग तुम खुश हो रहे, ठगनी पड़ती भारी....
हर एक बेवस को, ठगो नहीं रे ठगव्वा लोग...
बेवस नैना गिरते जो आंसू, हर आसूं अनमोल...
हर एक बेवस को ठगो नहीं रे ठगव्वा लोग...
तुम तो रंग महल में रहते, वह बेवस लाचार...
हर एक बेवस को, ठगो नहीं रे ठगव्वा लोग...
करनी धरनी साथ है चलती, कलयुग करनी जोर...
हर एक बेवस को, ठगो नहीं रे ठगव्वा लोग...
आज की जान दे कल की जान ले, मत अजमा तन जोर..
हर एक बेवस को, ठगो नहीं रे ठगव्वा लोग...
इस गीत के लेखक काली कुमाऊं से प्रकाशित वार्षिक सांस्कृतिक पुस्तक 'फुहारें' के संपादक हैं। जो काली कुमाऊं लोहाघाट के चानमारी में निवास करते हैं। वे कई समाचार पत्रों में संवाददाता पद पर कार्य चुके हैं।
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