बातों-बातों में:
भगवत प्रसाद पाण्डेय*
कुत्तों, खासकर आवारा कुत्तों में एक बीमारी होती है-खुजली। यह नमी के कारण बरसात होते ही बढ़ जाती है। चिकित्सक इसे 'डर्मेटाइटिस' कहते हैं। अपनी कुमाऊँनी बोली में हम बोलते हैं 'लुत्त्ता'। बेचारा कुत्त्ता जहाँ बैठा, वहीं खुजाने लगता, जहाँ खड़ा हुआ, वहीं पंजा हिलाना शुरू कर दिया। हालत बड़ी दयनीय हो जाती है। मानो शरीर के अधिकांश बाल छुट्टी पर चले गये हों और जो कुछ बचे रहते हैं, वह ऐसे दिखते हैं जैसे पलायन वाले गाँवों में कुछ जड़ों से जुड़े बचे-खुचे ठेठ पहाड़ी बूढ़े-बुढिया। लुत्त्ते वाले कुत्ते को देखकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते हुए दूर से ही "छी-छी" करते हैं, डंडा-पत्थर मार कर भगाते हैं। समझदार लोग उनसे उतनी ही दूरी बनाकर रखते हैं जितनी चुनाव के बाद नेता जनता से बनाकर रखते हैं।
हर साल की तरह इस बार भी इधर एनएच और पीडब्ल्यूडी आदि की सड़कों को भी "गड्ढा मुक्त" किया गया। बड़े साहब और ठेकेदार सब ने 'बातों-बातों में' सबको बताया- "अब सड़कों में चलने पर आपकी चप्पलों और गाड़ी के टायरों का आत्मविश्वास बढ़ जाएगा।" मगर गजब ये हुआ इस मई की ग्रीष्म ऋतु में विगत दो-तीन बारिश क्या हुई, सारी सड़कें फिर बीमार हो गईं। जहाँ-जहाँ डामर भरा था, वहाँ-वहाँ से कुत्तों के बालों की तरह उखड़ गया। छोटे-बड़े गड्ढे ऐसे उभर आए हैं,जैसे लुत्त्ता हुए कुत्ते के शरीर पर बालों के बीच खाली-खाली चकत्ते। सड़क को दूर से देखें तो वह लुत्त्ताग्रस्त का लगती हैं। सैलानियों की गाड़ी भी इनमें हिचकोले खा रही हैं और उनके मुख से भी 'छी-छी' शब्द निकल रहा है। यह सड़कों के लिए जिम्मेदार लोगों को सुनाई नहीं देता। उचित होगा "गड्ढा मुक्त सड़क" का प्रमाणपत्र देने से पहले किसी पशु चिकित्सक से आवश्यक जाँच कराते हुए फिटनेस रिपोर्ट भी लेनी चाहिए कि कहीं सड़क को लुत्त्ता तो नहीं होने वाला है?
*पाटन-पाटनी,लोहाघाट।
(लेखक साहित्यकार और राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)
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