भगवत कथा (बातों-बातों में):
पौधे लगाने वालों की नहीं, पौधे बचाने वालों का सम्मान हो
भगवत प्रसाद पाण्डेय*
हरेला फिर कल 16 जुलाई को आ गया। प्रकृति से जुड़ा पहाड़ का सबसे हरा-भरा लोकपर्व। हमारे पुरखे भी इस दिन पेड़ लगाते थे, धरती की हरियाली बढ़ाने के लिये। उन्हें पता था कि पेड़ की महत्ता। वे जानते थे पौधा लगाना आसान है, पेड़ बनाना कठिन। आज भी गाँवों में लोग हरेले पर पौधे लगाते हैं और साल भर उसकी देखभाल करते हैं। तभी तो वहाँ हरियाली बची हुई है। लेकिन सवाल यह है कि सरकारी भवनों के इर्द-गिर्द और सरकारी ज़मीनों के आसपास अक्सर बंजरपन ही क्यों दिखाई देता है?
उत्तराखंड बनने के बाद हरेला सरकारी पौधारोपण का एक बड़ा पर्व भी बन गया। हर साल बड़े-बड़े पौधारोपण अभियान चलते हैं। लेकिन इस दिन पौधारोपण कम, पौधारोपण के कार्यक्रम ज़्यादा होते हैं। उद्यान और वन विभाग के पौधों से पहले वहाँ कैमरे पहुँचते हैं। गड्ढों के बनने से पहले बैनर गड़ते हैं। फावड़ों और कुदालों से ज़्यादा प्रेस नोट चलते हैं।
इस बार भी चंपावत डिवीजन के अंतर्गत क्षेत्र में कल 16 जुलाई को हरेला पर्व पर 72220 पौधे रोपे जाएंगे। कई जगह तो एक पौधे को लगाने में दो नहीं, चार नहीं इससे कहीं ज्यादा हाथों को सहारा देना पड़ता है, लेकिन फिर भी इतने हाथ भी न पौधे की परवरिश कर पाते हैं और न उसकी हिफाजत। जनप्रतिनिधि, अधिकारी और कर्मचारी पूरे उत्साह से पौधे लगाते हैं। कैमरे मुस्कुराते हैं, अख़बार और डिजिटल मीडिया अगले दिन हरियाली से भर जाते हैं। उधर ज़मीन पर रोपे पौधे मुरझाने लगते हैं। न पानी, न रखवाला, न किसी की चिंता। शायद इसलिए सरकारी पौधों की उम्र अक्सर फोटो छपने तक ही होती है।
राज्य बने 25 वर्ष हो गए। हर साल लाखों पौधे लगाए जाने के दावे होते हैं। अगर उन दावों का आधा हिस्सा भी सचमुच पेड़ बन गया होता, तो आज उत्तराखंड में जंगलों को जंगल ढूँढने की ज़रूरत नहीं पड़ती। अगले हरेले तक पिछले साल के काफी पौधे गायब हो चुके होते हैं। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। उनकी जगह नए पौधे, नए गड्ढे, नए चेहरे और वही पुराने भाषण तैयार रहते हैं। लगता है, पौधारोपण नहीं, 'फोटोरोपण अभियान' चल रहा है। यह सब सरकारी नौटंकियां कब तक चलती रहेंगी, मालूम नहीं। हाँ, अब समय आ गया है कि पौधे लगाने वालों की नहीं, पौधे बचाने वालों की तस्वीरें छपें। उनका सम्मान हों, क्योंकि पौधे कैमरे की फ्लैश से नहीं, पानी, देखभाल और जिम्मेदारी से बड़े होते हैं।
*पाटन-पाटनी (लोहाघाट)।
(लेखक साहित्यकार और जिला राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)
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