Sunday Feb 22, 2026

सरस कॉर्बेट महोत्सव में आज

पहाड़ काट 2 किमी लंबी सुरंग बनाकर अपने गांव तक लाए थे नदी का पानी

देवभूमि टुडे

चंपावत/टनकपुर। टनकपुर रावत फार्म में आयोजित सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 में चौथे दिन आज 21 फरवरी को वीर भड़ माधोसिंह भंडारी के शौर्य, त्याग, बलिदान एवं विकास की अमरगाथा को गीत-नृत्य नाटिका के जरिए प्रस्तुत किया जाएगा। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम आज शनिवार 6:30 बजे से प्रस्तुत की जाएगी। निर्माता ममता भट्ट, संयोजक राजेंद्र सिंह रावत और बलदेव राणा के निर्देशन में गीतकार विकम कपरवाल, संगीतकार संजय कुमोला, सेट डिजाइनर राकेश पुंडीर, कला निर्देशन राजेश रावत के मार्गदर्शन में उत्तराखंडी गीत-नृत्य नाटिका प्रस्तुत होगा।

 

कौन हैं वीर माधो सिंह भंडारी:

महान योद्धा माधो सिंह भंडारी ने पहाड़ काट कर 2 किमी लंबी सुरंग बनाकर अपने गांव तक नदी का पानी लाए थे। माधो सिंह ने इस सुरंग के लिए अपने पुत्र गजे सिंह का बलिदान कर दिया था। 

उत्तराखंड के वीर योद्धाओं में से एक वीर भड़ हैं माधो सिंह भंडारी। जिनका पहाड़ी लोकगाथाओं में खास स्थान है। माधो सिंह भंडारी गढ़वाल के महान योद्धा, सेनापति और कुशल इंजीनियर थे। माधो सिंह का जन्म वर्ष 1595 में टिहरी जिले के मलेथा गांव (बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर देवप्रयाग और श्रीनगर के बीच) में हुआ था। इसलिए उन्हें माधो सिंह मलेथा भी कहा जाता है। 4 सदी पूर्व पहाड़ को काटकर नदी का पानी सुरंग बनाकर मलेथा तक लाने का काम नामी योद्धा माधो सिंह भंडारी ने किया था।

माधो सिंह भी अपने बहादुर पिता कालो सिंह भंडारी की तरह ही वीर और स्वाभिमानी थे। माधो सिंह भंडारी कम उम्र में ही श्रीनगर के शाही दरबार की सेना में भर्ती हो गए और वीरता व युद्ध कौशल के बल पर तत्कालीन राजा महीपति शाह (1631-35) की सेना के सेनाध्यक्ष के पद पर पहुंच गए।  माधो सिंह के नेतृत्व में महीपति शाह ने तिब्बत के दावा क्षेत्र से होने वाले लगातार हमलों से राज्य को सुरक्षित करने के साथ ही दावा क्षेत्र और अपने राज्य के बीच सीमा का निर्धारण किया था। इस कारण महीपति शाह ‘गर्भ-भंजक’ नाम से भी जाने जाते थे। सेना से अवकाश के समय अपने गांव में खेतीबाड़ी और उसर भूमि के हालात देखकर माधो सिंह का मन बहुत दुखी हुआ। मलेथा गांव के अलकनंदा और चंद्रभागा नदियों से घिरे होने के बावज़ूद भी वहां सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी। पानी की कमी के कारण स्थानीय लोगों का खेती करना बेहद मुश्किल था।

माधो सिंह ने इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए किसी भी तरह से मलेथा गांव में पानी लाने की ठानी। मलेथा गांव के सबसे नजदीक चंद्रभागा नदी बहती है, लेकिन नदी और गांव के बीच विशालकाय पहाड़ और चट्टानों के कारण नदी का पानी पहुंचाना बेहद दुरह कार्य था। माधो सिंह ने पहाड़ों के बीच से सुरंग बना पानी को गांव तक पहुंचाने पर विचार किया। कठोर चट्टानों के बीच से 2 किलोमीटर लंबी सुरंग किस प्रकार मलेथा तक पहुंचाई जाए? यक्ष प्रश्न था। माधो सिंह ने तुरंत ही एक स्थानीय विशेषज्ञों के दल बुला

लोगों को साथ लेकर सुरंग बनाने का काम शुरू कर दिया। 5 साल तक चले इस हिमालयी परिश्रम के बाद सुरंग बनकर तैयार हो गई। यह सुरंग अपने आप में आधुनिकतम इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है।

स्थानीय कहानियों एवं प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार माधो सिंह ने अपने पुत्र गजे सिंह का इस सुरंग के लिए बलिदान कर दिया था। जब सुरंग बनकर तैयार हो गई थी, तो नदी के पानी को सुरंग से ले जाने के तमाम प्रयासों के बावज़ूद भी नदी का पानी सुरंग में नहीं पहुंचाया जा सका था। एक रात माधो सिंह को स्वप्न आया कि देवी उनसे अपने एकमात्र पुत्र का बलिदान करने को कह रही है। यह बात उन्होंने परिवार के साथ गांव के लोगों को बताई कि सुरंग से पानी लाने के लिए उन्हें अपने इकलौते बेटे गजे सिंह की बलि देनी होगी। माधो सिंह इस विचार के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन गजे सिंह लोकहित के लिए इस बलिदान के लिए खुद ही राज़ी हो गए।

गजे सिंह ने पिता माधो सिंह से कहा कि अगर ऐसा करने से मलेथा गांव के लोगों को पानी मिल सकता है और यहां की बंज़र भूमि उपजाऊ हो सकती है, तो उन्हें यह बलिदान देना ही चाहिए। सर्वसम्मति से गजे सिंह की बलि दी गई और उनके सिर को सुरंग के मुंह पर रखा दिया गया। इसके बाद जब नदी के पानी को सुरंग की ओर मोड़कर गुज़ारा गया, तो पानी सुरंग से होते हुए गजे सिंह के सिर को अपने साथ बहा कर ले गया और गजे सिंह के सिर को खेतों में स्थापित कर दिया। वहीं अन्य जनश्रुतियों के अनुसार ये भी माना जाता है कि माधो सिंह भंडारी किन्हीं कारणों से यह नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र गजे सिंह सुरंग निर्माण के कार्यस्थल पर आए। परंतु एक दिन जिद करके गजे सिंह वहां पहुंच गया और पहाड़ से बड़ा सा पत्थर लुढ़ककर उसके सिर पर लगा जिससे उसकी मौत हो गयी। बाद में जब सुरंग में पानी आया तो वह उस जगह तक पहुँच गया था जहां पर गजे सिंह की मौत हुई थी। पुत्र के बलिदान से आहत गजे सिंह की माता उदीना ने श्राप दिया था कि अब से इस परिवार अब कोई ‘भड़’ अर्थात वीर पैदा नहीं होगा।

सुरंग से नदी का पानी मलेथा गांव तक पहुंचाने के बाद माधो सिंह वापस श्रीनगर राजा महीपति शाह के पास चले गए और फ़िर कभी गांव लौटकर न आने का फैसला किया। “एक सिंह रैंदो बण, एक सिंह गाय का। एक सिंह माधो सिंह और सिंह काय का।” उत्तराखंड में प्रसिद्ध इस लोकोक्ति का अर्थ है- एक सिंह वन में रहता है, एक सींग गाय का होता है। एक सिंह माधो सिंह है, इसके अलावा बाकी सिंह बेकार हैं। वर्तमान में मलेथा गाँव का सम्पूर्ण इलाका हरा-भरा और कृषि सम्पदा से पूर्ण है। माधो सिंह भंडारी के त्याग, परिश्रम और दृढ इच्छाशक्ति द्वारा बनाई गई यह नहर आज तक भी गाँव में पानी पहुँचा रही है।




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