Wednesday Sep 30, 2026

भगवत कथा (बातों-बातों में)

भगवत प्रसाद पाण्डेय*

श्रद्धा और श्राद्ध

इन दिनों श्राद्ध पक्ष शुरू हो चुका है। पुरानी फिल्म 'झुक गया आसमान' का वह गीत शायद आपको भी याद होगा— “जिस्म को मौत आती है लेकिन, रूह को मौत आती नहीं है।” हमारी सनातन मान्यता भी यही है कि आत्मा अजर-अमर है। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि-

न जायते म्रियते वा कदाचित्

नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

(आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी उसका नाश नहीं होता।)

इसके साथ यह श्लोक भी बहुत प्रसिद्ध है—

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्

अन्यानि संयाति नवानि देही॥

(मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।)

लोकविश्वास है कि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार पाप-पुण्य का भागी बनता है। अच्छे कर्म उसे श्रेष्ठ लोकों की ओर ले जाते हैं और बुरे कर्मों का फल भी उसे भोगना पड़ता है। इसी कारण अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना हमारी संस्कृति में सदैव बनी रही है। श्राद्ध उसी श्रद्धा की अभिव्यक्ति है।

मान्यता है कि श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितृगण अपने वंशजों को विद्या, धन, आयु, आरोग्य और संतति का आशीर्वाद देते हैं। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक का समय पितृपक्ष या ‘सोलह सराद’ कहलाता है। इन दिनों लोग अपने पितरों का स्मरण कर तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं।

यदि केवल पहाड़ की बात करें तो यहाँ श्राद्ध के प्रति विशेष आस्था देखने को मिलती है। अपने स्वजन की पुण्यतिथि पर एकोदिष्ट श्राद्ध, पितृपक्ष में पार्वण श्राद्ध तथा मांगलिक अवसरों पर आभ्युदायिक श्राद्ध करने की परम्परा आज भी यथावत  प्रचलित है। तीर्थस्थलों और नदी तटों पर भी श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किए जाते हैं।

मेरे बचपन की अनेक स्मृतियाँ श्राद्ध से जुड़ी हुई हैं। उन दिनों लोगों को यह कहते हुए सुनते थे कि-"पितृपक्ष में पितर अदृश्य रूप से धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा अर्पित जल, तर्पण तथा पिंडदान से तृप्त होते हैं।" यही विश्वास लोगों को श्राद्ध के प्रति और अधिक श्रद्धावान बनाता था।

श्राद्ध की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती थी। कह सकते हैं कि हर व्यक्ति श्राद्ध को लेकर सतर्क रहता है। बामन ज्यू (पुरोहित जी) को तिथि याद दिला दी जाती, यद्यपि वे भी अपने यजमानों की तिथियाँ पंचांग या डायरी में  रखते थे। चेली-बेटियों, भांजों, रिश्तेदारों तथा पड़ोसियों को ‘सराद का भात’ खाने का निमंत्रण दिया जाता। पूड़े बनाने के लिए तिमिल या मालू के पत्ते, तर्पण, श्राद्ध की सामग्री, जौं-तिल, कुश तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ पहले ही जुटा ली जाती थीं।

श्राद्ध।

घर में दाल-चावल साफ किए जाते, रायते के लिए ककड़ी कोरी जाती, बड़ के लिये उड़द भिगोया जाता और रसोई के सभी बर्तन चमका दिए जाते। उस समय अधिकांश घरों में न टाइल्स थीं और न ही सीमेंट के फर्श। रसोई और देली को लीप-पोतकर शुद्ध किया जाता तथा मुख्य द्वार पर जौं के दाने बिखेरे जाते।

श्राद्ध की रसोई भी अपने आप में विशेष पवित्रता लिए होती थी। खड़ी दाल, भात, गाबे की थेचड़ी, पूरी, बड़े, रायता, चटनी, 'लसपस' खीर, सलाद, दाड़िम के गूदे, अखरोट की गिरी और अदरक के टुकड़े तक भोजन का हिस्सा होते थे। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि पितरों के प्रति श्रद्धा का प्रसाद माना जाता था।

उस समय पहाड़ के गाँवों मे संयुक्त परिवारों का चलन था। श्राद्ध की तिथि आते ही घर का हर सदस्य अपने-आप काम में जुट जाता। कोई रायता बनाता, कोई चटनी पीसता, कोई सब्जी काटता तो कोई आटा गूँधता। बहू-बेटियाँ सिलबट्टे पर भीगे हुए मास (उड़द) पीसती दिखाई देतीं। पूरा घर मानो एक सामूहिक आयोजन का केंद्र बन जाता।

उधर भोजन तैयार होता रहता और इधर पुरोहित जी की प्रतीक्षा। तब अधिकांश गाँव सड़क सुविधा से नहीं जुड़े थे। पंडित जी कई-कई गाँवों, घरों में श्राद्ध कराते हुए पैदल पहुँचते थे। आश्विन की धूप हो या शरद ऋतु की सरदिया झड़ी, वे अपना दायित्व निभाते रहते। घर पहुँचने पर पहले उन्हें चाय दी जाती, फिर वे श्राद्ध सामग्री देखते और तर्पण, पिंडदान तथा अन्य विधियाँ सम्पन्न कराते। लगभग एक-डेढ़ घंटे तक चलने वाले इस कर्मकाण्ड के बाद वे सभी को आशीर्वाद देते और सम्मानपूर्वक विदा किए जाते।

परम्परा के अनुसार पहले पंडित जी, घर के बुजुर्ग और अतिथि भोजन करते थे। उसके बाद बच्चों की बारी आती थी—‘सराद का भात’ खाने की। आज सोचता हूँ कि बच्चों को पहले भोजन क्यों नहीं कराया जाता था? पर तब यह व्यवस्था स्वाभाविक मानी जाती थी। जिन बच्चों या रिश्तेदारों का आना संभव नहीं होता, उनके घर तक भी एक थाली में ‘सराद का भात’ पहुँचाया जाता था।

आज पहाड़ के गाँवों से पलायन बढ़ा है। घर खाली हो रहे हैं और लोग शहरों में बस रहे हैं। फिर भी संतोष की बात है कि श्राद्ध की परम्परा आज भी जीवित है। हाँ, शहरों में पले-बढ़े बच्चों को हमारे बचपन जैसा सामूहिक ‘सराद का भात’ खाने का आनंद शायद ही मिल पाता हो।

कभी-कभी यह भी सोचता हूँ कि यदि हमारे पितर सचमुच श्राद्ध पक्ष में धरती पर आते होंगे, तो उन्हें भी बड़ा आश्चर्य होता होगा। जिन गाँवों में कभी सराद के भात के लिए बच्चों की कतार लगती थी, वहाँ अब कई घरों में ताले लटके मिलते हैं। फिर भी यह संतोष की बात है कि पहाड़ का आदमी चाहे दिल्ली में हो, हल्द्वानी में हो या विदेश में, पितरों को याद करना नहीं भूला है।

शायद यही हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है कि बदलते समय, बदलती जीवनशैली और पलायन के बावजूद पितरों के प्रति श्रद्धा का भाव आज भी जीवित है। यही भाव हमारी पीढ़ियों को अतीत से जोड़ता है और यही हमारी पर्व-परम्पराओं की वास्तविक शक्ति भी है।

इसलिये श्राद्ध केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति स्मरण, सम्मान और कृतज्ञता का पर्व है। यही कारण है कि सदियों से चली आ रही यह परम्परा आज भी हमारे समाज और संस्कृति को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है। घर बदल गए, गाँव बदल गए, हम लोगों की जीवन शैली बदल गई परन्तु पितरों को याद करने की हमारी परम्परा नहीं बदली। यही मेरे पहाड़ की संस्कृति की सबसे बड़ी पूँजी है।

*निवासी पाटन पाटनी (लोहाघाट)

(लेखक साहित्यकार और राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)

 






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