Wednesday Aug 5, 2026

भगवत कथा (बातों-बातों में:)

भगवत प्रसाद पांडेय
श्रीहनुमान जी के पास अपार शक्ति थी, किंतु उन्हें स्वयं अपनी शक्ति का स्मरण नहीं था। जामवंत को उन्हें याद दिलाना पड़ा। 'का चुप साधि रहा बलवाना' मनुष्य की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही होती है। हममें से अधिकांश लोग अपनी क्षमताओं को पहचान ही नहीं पाते। यदि हम अपनी शक्ति को पहचानकर उसका सही उपयोग करें, तो असंभव भी संभव हो सकता है।
चंपावत नगर के समीप एक गांव है-शक्तिपुर। इस गांव में एक वीर सैनिक के इकलौते पुत्र रहते हैं। उनका नाम हैं जगदीश चंद्र पाण्डेय। अपनी कर्मठता, सादगी, सौम्यता और बहुमुखी प्रतिभा के कारण सचमुच गांव के नाम को सार्थक करते हैं। जगदीश उन लोगों में हैं, जो किसी भी काम को पूरे मनोयोग और दक्षता से करते हैं। घर-गृहस्थी के सभी कार्यों के साथ-साथ बिजली, पानी और अन्य तकनीकी कार्यों से लेकर खेती, बागवानी, मौनपालन, पशुपालन और भवन निर्माण तक-हर क्षेत्र-हर क्षेत्र में उनकी दक्षता, मेहनत और लगन स्पष्ट दिखाई देती है।
उनके घर, बाग-बगीचे पहुंचते ही मन में अलौकिक शांति, संतोष, ऊर्जा और कुछ नया करने की प्रेरणा जाग उठती है। करीब 55 नाली भूमि के स्वामी जगदीश पांडेय ने अपनी जमीन के एक-एक कोने का सदुपयोग किया है। सचमुच ऐसा लगता है मानो उनकी धरती सोना उगल रही हो। उनके पास होल्स्टीन-फ्रीजियन (एचएफ), साहीवाल, सिंधी और जर्सी नस्ल की कुल 8 गाएं हैं। वर्तमान में दो-तीन दुधारू गायों से रोजाना करीब 50 लीटर दूध प्राप्त हो रहा है। गायों के लिए बनी व्यवस्थित गौशाला भी उन्होंने स्वयं अपने हाथों से तैयार की है। ये निर्माण किसी कुशल राजमिस्त्री जैसा है।
 

शक्तिपुर में जगदीश चंद्र पांडेय के बगीचे में फलों से लदे पेड़।

घर के चारों ओर मधुमक्खियों के डिब्बों के भीतर से मधुर भिनभिनाहट सुनाई देती है। प्रत्येक बॉक्स से औसतन लगभग 4 किलोग्राम उत्तम गुणवत्ता का शहद प्राप्त होता है। इन दिनों उनके पॉलीहाउसेज में खीरा, ककड़ी, करेला, फ्रेंचबीन, टमाटर और शिमला मिर्च की भरपूर खेती हो रही है। खुले खेतों में खुबानी, हिमालयी चेरी, कीवी, माल्टा, अखरोट और नाशपाती के वृक्ष लहलहा रहे हैं। वहीं सेब की रेड डिलीशियस, रेड लामा गाला, टेरेक्स गाला, जेरोमिन, किंग रॉट तथा ग्रैनी स्मिथ जैसी उन्नत किस्मों से लदी डालियां उनकी मेहनत की कहानी स्वयं कह रही हैं।
आज जब उत्तराखंड में बड़ी संख्या में लोग खेती, बागवानी और पशुपालन से विमुख होकर पलायन को ही विकल्प मान रहे हैं, तब जगदीश पांडेय अपने कार्यों से यह सिद्ध कर रहे हैं कि यदि मनुष्य अपनी शक्ति को पहचान ले और उसका सही दिशा में उपयोग करे, तो सफलता स्वयं उसके द्वार पर दस्तक देती है।
हम प्राय: संसाधनों की कमी, अवसरों के अभाव, समय की कमी तथा जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान का हवाला देते हैं। किंतु जगदीश पांडेय केवल एक सफल प्रगतिशील किसान ही नहीं, बल्कि इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि जब मनुष्य अपनी शक्ति को पहचान लेता है, तब सीमित संसाधन भी असीम संभावनाओं में बदल जाते हैं।
यदि प्रत्येक गांव में एक-एक ऐसे जगदीश पांडेय तैयार हो जाएं, तो खेती फिर से सम्मान का विषय बनेगी, पहाड़ों से पलायन रुकेगा, खेत बंजर नहीं रहेंगे और गांव आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। वास्तव में राष्ट्र निर्माण किसी बड़ी योजना से नहीं, बल्कि ऐसे ही कर्मयोगियों के हाथों होता है। श्रीहनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण जामवंत ने कराया था। आज आवश्यकता है कि हम भी अपने भीतर के जामवंत को जगाएं और स्वयं से पूछे-क्या हमने अपनी शक्ति को पहचाना है?
भगवत प्रसाद पाण्डेय
(लेखक साहित्यकार और राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)।
 




Share on Facebook Share on WhatsApp

© 2026. All Rights Reserved.