प्रकाश जोशी शूल*
तुम क्यों धूम्रपान करते ऐ नौजवान मेरे, तुम क्यों धूम्रपान करते।
तन मन प्राण मेरे, तुम क्यों धूम्रपान करते।
रगो में क्या नहीं है तेरे खून निज पता का,
क्या ख्याल नहीं तुझको जननी की अस्मिता का।
ऐ स्वाभिमान मेरे, तुम क्यों धूम्रपान करते।
कहां गए वो सपने कहां बदन की लाली।
कहां गई वो ताकत, जो पांखू में तुमने पाली।
ऐ आसमान मेरे तुम क्यों धूम्रपान करते।
अनार गाल तेरे सूखी मूली से हो गए हैं।
असमय ही बाल तेरे पंचाचूली से हो गए हैं।
ऐ कली इंसान मेरे तुम क्यों धूम्रपान करते।
तेरे कर्म कहां खोए तेरा धर्म कहां खोया।
बेशर्म बना तू है, तूने शर्म कहां खोया।
ऐ भगवान मेरे तुम क्यों धूम्रपान करते।
राहों में शूल तेरे तुम फूल खिला देना।
अभिमानी इस धुएं की चूल हिला देना।
ऐ वरदान मेरे तुम क्यों धूम्रपान करते।
क्वेराला घाटी, चंपावत।


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