Wednesday Jun 24, 2026

पहाड़ की पारंपरिक मौसमी प्रवास व्यवस्था का जीवंत उदाहरण है म्वाला

बातों-बातों में:-

भगवत प्रसाद पांडेय*

टनकपुर-तवाघाट राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित स्वाला गाँव का एक रोचक किंतु दुर्भाग्यपूर्ण किस्सा आज डिजिटल युग में खूब चर्चा मे है। सोशल मीडिया के अनेक यू-ट्यूबर्स, ब्लॉगरों, फेसबुक और रील बनाने वालों ने स्वाला गाँव के नीचे स्थित उसके तोक म्वाला को "भूतिया गाँव" के रूप में प्रचारित कर दिया है। कई जगह प्रिंट मीडिया में भी ऐसी बातें प्रकाशित हुई हैं। परिणाम यह हुआ कि सुनी-सुनाई बातों पर आधारित अफवाहों का ऐसा जाल बुना गया कि स्वाला के ग्रामीण आज भी उससे उबर नहीं पा रहे हैं।

फरवरी 1952 में स्वाला के निकट विश्रामघाट में पीएसी का एक ट्रक गहरी खाई में गिर गया था। यह सत्य है कि उस दुर्घटना में अनेक जवानों की मृत्यु हुई थी। लेकिन बाद में इस हादसे को स्वाला गाँव से जोड़कर तरह-तरह की कहानियाँ गढ़ ली गईं। प्रचारित किया गया कि दुर्घटना में घायल जवानों की गाँव वालों ने सहायता नहीं की, उन्हें तड़पने के लिए छोड़ दिया और उनका सामान तक लूट लिया। कहा जाने लगा कि मृत जवानों की आत्माएँ गाँव में भटकती हैं और लोगों को परेशान करती हैं। इसी कारण गाँव उजड़ गया है। जबकि स्थानीय निवासी और आसपास के लोग इन बातों को पूरी तरह मनगढ़ंत और भ्रामक बताते हैं। स्थानीय जनश्रुतियों में भी इन कथाओं का कोई ठोस आधार नहीं मिलता।

म्वाला गांव।

वास्तव में स्वाला जनपद चंपावत की तहसील चंपावत का एक राजस्व ग्राम है, जो मुख्यतः गडेरी उत्पादन के लिए जाना जाता है। पिछले कुछ वर्षों से स्वाला की पहाड़ी पर लगातार हो रहे भू-स्खलन और उसके कारण राष्ट्रीय राजमार्ग के बार-बार बाधित होने से भी यह क्षेत्र चर्चाओं में रहा है।

स्वाला में मुख्यतः भट्ट (ब्राह्मण) परिवार निवास करते रहे हैं। मुझे भी वर्ष 1972 में इस गाँव को निकट से देखने का अवसर मिला था। तब वहाँ लगभग 30-35 परिवार रहते थे। उनकी आजीविका कृषि, पशुपालन, ग्रेफ (बीआरओ) में मजदूरी तथा वाहन संचालन पर आधारित थी। गाँव के नीचे मुख्य सड़क के पास एक प्राथमिक विद्यालय, वन विभाग की लीसा भंडार, ग्रेफ की लेबर हट और एक-दो छोटी दुकानें भी थीं।

स्वाला गाँव सड़क से ऊपर पहाड़ी पर बसा है। इसके निवासी शीतकाल में लगभग तीन-चार किलोमीटर नीचे स्थित म्वाला नामक स्थान पर चले जाते थे। राष्ट्रीय राजमार्ग से देखने पर म्वाला में काली स्लेटों से ढके लगभग 18-20 पत्थर के मकानों की लंबी कतार और उनके दोनों ओर फैले सीढ़ीनुमा खेत साफ दिखाई देते हैं।

दीपावली के बाद म्वाला की ओर होने वाला यह सामूहिक प्रस्थान किसी पर्व से कम नहीं होता था। लोग अपने पशु, गृहस्थी का सामान, कपड़े और आवश्यक सामग्री साथ ले जाते। इष्टदेव की पूजा होती, घरों में पकवान बनते और महिलाएँ पारंपरिक आभूषणों तथा वेशभूषा से सुसज्जित होतीं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी में विशेष उत्साह रहता था। पूरा शीतकाल म्वाला में खेती-बाड़ी और पशुपालन करते हुए बिताया जाता था। होली से पहले लोग पुनः अपने मूल गाँव स्वाला लौट आते थे। हालांकि वर्ष भर दोनों स्थानों के बीच उनका आना-जाना बना रहता था।

समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती गईं। रोजगार के नए अवसर खुले। कुछ परिवार चंपावत नगर में बस गए तो कुछ ने राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास अपने घर बना लिए। उत्तराखंड के अन्य पर्वतीय गाँवों की तरह यहाँ भी खेती से मोहभंग बढ़ता गया। जंगली जानवरों द्वारा फसलों को होने वाला नुकसान, मुफ्त अनाज योजनाएँ और बदलती जीवनशैली ने कृषि को पीछे धकेल दिया। परिणामस्वरूप स्वाला के लोगों का अपने ही तोक म्वाला से जुड़ाव कम होता चला गया। ग्रामीण गोपाल दत्त भट्ट और ईश्वरी दत्त भट्ट (पूर्व ग्राम प्रधान) बताते हैं कि आज भी म्वाला पूरी तरह सुनसान नहीं है। तीन-चार परिवार वहाँ आते-जाते रहते हैं और अपनी जमीनों की देखभाल करते हैं। उन्हें न कोई डर सताता है और न कोई भूत-प्रेत दिखाई देता है।

ऐसे में न जाने किसने, कब और क्यों यह अफवाह फैला दी कि सड़क के नीचे दिखाई देने वाला स्वाला का यह तोक "भूतिया गाँव" है। सोशल मीडिया ने बिना सत्यापन के इस कल्पना को इतना फैलाया कि धीरे-धीरे वह लोगों को सच जैसी लगने लगी। जबकि वास्तविकता यह है कि म्वाला कोई भूतिया गाँव नहीं, बल्कि पहाड़ की उस पारंपरिक मौसमी प्रवास व्यवस्था का जीवंत उदाहरण है, जो कभी पूरे कुमाऊँ में सामान्य जीवनशैली का हिस्सा हुआ करती थी।

आज के सोशल मीडिया युग में किसी स्थान, व्यक्ति या घटना को बिना तथ्य जाने बदनाम कर देना बेहद आसान हो गया है। म्वाला की कहानी इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है, जहाँ अफवाहों ने इतिहास और वास्तविकता पर पर्दा डालने का प्रयास किया। किंतु सच यह है कि यह गाँव आज भी वहीं खड़ा है—शांत, सरल और निर्विवाद।

आज उत्तराखंड के अनेक गाँव पलायन के कारण वीरान हो चुके हैं। यदि यही प्रवृत्ति रही, तो क्या कल हर खाली पड़े गाँव को भी मीडिया "भूतिया गाँव" घोषित कर देगा?

*लेखक सहित्यकार और राजस्व विभाग के अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं)




Share on Facebook Share on WhatsApp

© 2026. All Rights Reserved.