भगवत कथा (बातों-बातों में)
भगवत प्रसाद पांडेय*
आज कार्तिक चतुर्थी (29 अक्टूबर) को करवा चौथ की धूम है। कुछ सालों से हमारे पहाड़ में भी करवाचौथ ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए हैं। देखा-देखी यह पर्व अब पहाड़ के घरों में भी ऐसी पैठ बना चुका है कि लगता है, जैसे बरसों से यहीं का बाशिंदा हो। अच्छी बात है कि पत्नियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। आखिर पति भी तो उसी घर-परिवार का एक महत्त्वपूर्ण प्राणी होता है, लेकिन सवाल यह है कि हमारे पहाड़ में पति की लंबी उम्र की कामना करने वाले व्रतों की पहले से ही कमी कहाँ थी?
वट सावित्री व्रत की पर्व-परंपरा यहाँ रही है, जिसे पहाड़ की महिलाएँ श्रद्धा से निभाती आई हैं। मगर अब लगता है कि पुरानी परंपराएँ कुछ ज्यादा ही पिछड़ गई हैं और करवाचौथ ने अपने-अपने सजनों के लिए सजने-सँवरने की प्रतियोगिता में बाजी मार ली है।
वर्ष में दो बार संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी घर-घर में रखने की परंपरा इन पहाड़ों में रही है। नवरात्र में भी 9-9 दिन महिलाएँ व्रत-उपवास करती ही हैं। इसके अलावा कई वार्षिक, मासिक और साप्ताहिक व्रत होते ही रहते हैं। मगर वहाँ इतना साज-श्रृंगार, इतनी खरीदारी और इतनी तैयारी क्यों नहीं दिखाई देती? करवाचौथ आते ही न जाने कौन-सा सौंदर्य-बोध जाग उठता है कि साड़ी से लेकर गहनों तक, मेहँदी से लेकर मेकअप तक, हर चीज का हिसाब-किताब कई दिन पहले से होने लगता है। ऐसा लगता है, पति की दीर्घायु का मामला सीधे ब्यूटी पार्लर के काउंटर से जुड़ गया हो।
अब प्रश्न यह है कि जो पर्व हमारे पहाड़ में मुश्किल से 10 से 15 साल पहले तक इतना प्रचलित नहीं था, वह अचानक इतना लोकप्रिय कैसे हो गया? क्या पति की उम्र बढ़ाने की कोई नई तकनीक हाथ लग गई है या फिर टीवी धारावाहिकों, सोशल मीडिया और बाजार ने मिलकर इस व्रत का ऐसा प्रचार किया है कि सभी पुरानी परंपराएँ भी फीकी पड़ने लगी हैं?
माना कि व्रत रखना आस्था और व्यक्ति का निजी विषय है और सजना-सँवरना हर किसी की अपनी-अपनी पसंद। इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? मगर जरा सोचिए, पति की लंबी उम्र के लिए रखे जाने वाले दूसरे व्रतों में इतनी सजावट की जरूरत क्यों नहीं पड़ती? कहीं ऐसा तो नहीं कि करवाचौथ में पति की उम्र के साथ-साथ अपनी साड़ी, गहने और तस्वीरों की चमक बढ़ाने का अवसर भी जुड़ गया है? सोशल मीडिया पर चाँद के साथ अपनी तस्वीर चमकाने का मोह भी कम नहीं।
खैर, जमाना बदल रहा है। परंपराएँ भी बदलेंगी। बस इतना है कि पहाड़ की पुरानी परंपराएँ कहीं नई चमक-दमक के आगे गुम न हो जाएँ इसका भी ध्यान रखना ही चाहिए। आखिर पति की लंबी उम्र तो व्रत से माँगी जाती है, लेकिन करवाचौथ की तैयारी देखकर लगता है कि पति की उम्र भगवान के भरोसे और सजने-सँवरने का जिम्मा बाजार के भरोसे है। करवाचौथ का व्रत लेने वाली महिलाओं को बधाई और उनके पति की दीर्घायु की कामना।
■निवासी-पाटन पाटनी, लोहाघाट।
(लेखक साहित्यकार और राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)
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