Monday Aug 17, 2026

डॉ. देवी दत्त जोशी की कलम से

अभी अपने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी ने विद्यार्थियों के साथ संवाद किया। 'यदि मैं मुख्यमंत्री होता' बहुत अच्छा लगा। छोटे बच्चों ने अपनी जिज्ञासा और वे क्या सोचते है, उनके अनुसार जो समस्याओं उनके समक्ष आईं और उनके समाधान के लिए वे क्या और कैसा सोचते हैं उस पर भी उन्होंने विचार रखे। कुछ बच्चों ने प्रश्न के साथ अपने सुझाव भी रखे, जिन्हें मुख्यमंत्री ने सराहा भी। यह अच्छी परिपाटी हो सकती है सीधे संवाद की, परन्तु यह हर वर्ग से हो जिसमें समय-समय पर प्रत्येक विभाग के मंत्री भी अपने विभाग से सम्बंधित सुझाव ले सकते हैं। साथ ही सरकार को जनसंवाद भी आयोजित करने चाहिए।

मैं आज 80 वर्ष का हो चुका हूँ। 55 वर्षों से चिकित्सा कार्य से जुड़े रहने के साथ सामाजिक कार्यों जैसे शिक्षा व खेलकूद आदि जो युवाओं के विकास के लिये आवश्यक होते है, उनसे भी जुड़ा रहा। उनके बीच उनकी जिज्ञासाओं से रूबरू हो उनसे सीखा भी उन्हें अपने अनुभव के अनुसार सुझाव भी देता रहा।

 

 

मुख्यमंत्री और विद्यार्थियों के बीच संवाद से मेरे मन में भी आया-'यदि मै मुख्यमंत्री होता तो क्या करता?' आरम्भ होता पूरे प्रदेश की भौगौलिक स्थिति से परिचय यहाँ की वनस्पति जलवायु खनिज यहाँ की मूलभूत समस्याओं का अध्ययन करने के बाद विकास के लिये अनेक अनुभवी लोगों से संवाद जो मैं करता रहा हूँ। सबसे पहले यहाँ की भौगौलिक स्थिति के अनुसार जल स्रोतों का अध्ययन, जिनमें नौले धारायें नदियों का उपयोग जिनसे पीने के पानी सिंचाई के पानी की व्यवस्था और नदियों में छोटे-छोटे बांध जो सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाओं  को आरम्भ करना जिससे सिंचाई और बिजली की समस्या का समाधान होता।

उसके बाद देवभूमि मे प्राप्त होने वाली जड़ीबूटियां और फल फूल वनस्पति पर आधारित लघु उद्योगों की स्थापना, जिससे पलायन रुके। क्योकि ये लघु उद्योग रोजगार पैदा करते और रोजगार ही पलायन को रोक सकता है। पलायन का पहला और बड़ा कारण है रोजगार का न होना। रोजगार के बाद शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं का विकास स्वत: हो जाता। पिछले 5 दशक से देख रहा हूँ एक मात्र सेब के विकास में करोड़ों रुपये खर्च हो गये, लेकिन पता नहीँ इससे प्रदेश को कितना लाभ हुआ?

हमारे प्रदेश में प्रकृति ने अनेक जड़ीबूटियां फल फूल दिये हैं, जिन पर आधारित लघु उद्योग यहा क्यों स्थापित नहीँ किये गये? यहाँ की जड़ीबूटियों से प्रदेश में ही औषधि निर्माण के कारखाने स्थापित करने पर विचार होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीँ हुआ। रानीबाग का HMT घड़ी का कारखाना क्यो बन्द हुआ? भीमताल का टेलीविजन का कारखाना क्यो बन्द हुआ? चम्पावत में KMVN की रोजिन टरपंटाइन फैक्ट्री क्यों बन्द हुई?

ऐसे अनेक हैं, जो चले स्थापित हुए और बन्द हो गये। यहां पर यदि फल फूल जड़ीबूटियों पर आधारित कारखाने होते तो, सम्भवतः बन्द न होते। ऐसे लघु उद्योगों के कारखाने प्रत्येक पर्वतीय जिलों में आरम्भ कर पलायन रोका जा सकता है। सिडकुल के कारखानों के कारण पलायन और अधिक बड़ गया। पहाड़ खाली हो गये और मैदान में बोझ बड़ गया यानी दोनों को झटका। अपने आप जमने वाले घास पौधों को हम खरपतवार कहते हैं, उनमें औषधीय गुण होते है। जैसे सिसौण, किनमोड़ा, हेंसालू, घिंघारू इनमे भी लघु उद्योग छिपा है। इनके गुणों से गांवों के अशिक्षित लोग तो परिचित हैं, परन्तु शिक्षित लोगों ने इनकी उपेक्षा की है। इसलिए पलायन हुआ इनपर ध्यान देने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड को विशेष कर नेपाल और उत्तराखंड की सीमा पर काली नदी की अपेक्षाकृत गरम घाटियाँ मे पाया जाने वाला कल्पवृक्ष च्यूरा, जो अनेक लघु उद्योग स्थापित करने की क्षमता रखता है, उसकी उपेक्षा समझ से बाहर है। मैं इसे कल्पवृक्ष इसलिए कहता हूँ क्यूंकि सम्भवतः यह विश्व का एकमात्र वृक्ष होगा, जिसके फूल फल गुठली लकड़ी पत्ते सभी उपयोगी हों और ऐसा वृक्ष यदि उपेक्षित है तो यह हमारी जनता, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और सरकार की अकर्मण्यता का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस कल्पवृक्ष में शहद का भंडार है। वनस्पति घी का भंडार है कॉसमैटिक्स एण्टी सेप्टिक औषधियों में काम आने वाला पामेरियन एसिड, जो विदेश से आयातित पाम आयल से प्राप्त करते है। जिसमें मात्र 40% है जबकि च्यूरा में 80% से अधिक है और 36% ओलिक एसिड, जो साबुन उद्योग में काम आता है। और ऐसा कल्पवृक्ष उपेक्षित है। देवभूमि को प्रकृति ने इतना वरदान दिया है और हम इसका उपयोग नही कर पाये, तो यह हमारी अकर्मण्यता नहीँ तो क्या है।?

भारत एक कृषि प्रधान देश था और होना भी चाहिए परन्तु हमारी गुलाम मानसिकता ने हमें विदेश का नकलची बना दिया है। हमने अपने ज्ञान को भुला विदेश की नकल कर जिस प्रकार की बीमारी मोल ली है, जिससे बड़े-बड़े अस्पताल खुल जा रहे हैं परन्तु रोग कम होने का नाम नहीँ ले रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है कृषि में अन्धाधुन्ध रसायनों का प्रयोग। इससे बचने के लिए प्रत्येक जिले में एक बडी देशी गायों की गौशाला के साथ छठी से बारहवीं कक्षा तक कृषि विद्यालय जिसमें गोबर गौमूत्र से अनाज और साग सब्जी का उत्पादन आधुनिक तकनीक से हो। हमे ऐसे गौरक्षक नहीँ चाहिए, जो गौमाता को कटने से तो बचाये परन्तु उन्हें मरने के लिये सड़क पर छोड़ दें। देशी गौपालक को सरकार से 2 हजार रुपये प्रति गाय अनुदान की व्यवस्था हो। ऐसे कृषि विद्यालय से जो बालक कृषि क्षेत्र में उतरे उसे भी कुछ मानदेय दिया जाय। कृषि पर भी जोत के अनुसार आयकर लगे। कृषि पर आयकर न लगना धनवानों, नेताओं और बड़े अधिकारियों को भ्रष्टाचार का अवसर देता है।

संविधान मे सबके लिये समान शिक्षा की व्यवस्था है। अतः सरकारी विद्यालय हों या व्यक्ति विशेष के, शिक्षा सबकी समान हो। शिक्षा को व्यापार का रूप न दिया जाय। ऐसे व्यवस्था हो तब देश की प्रतिभाओं को समान अवसर प्राप्त होगा। चिकित्सा के क्षेत्र में जो वैकल्पिक चिकित्सा है, उसे भी अवसर मिले। इसके लिये प्रत्येक मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में कम से कम 2 वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के विभाग खोलकर उन्हें भी चिकित्सा के साथ-साथ शोध के अवसर मिलें। देश में चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिये वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को अवसर देने से रोजगार, पलायन पर लगाम, चिकित्सा सुविधाओं सभी को लाभ होगा। होम स्टे के साथ भी वैकल्पिक चिकित्सा बहुत लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

यदि मैं मुख्यमंत्री हो जाऊँ तो पलायन रोकने स्थानीय रोजगार शिक्षा और चिकित्सा व्ववस्था पर ध्यान केन्द्रित कर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करूँगा। किसी भी क्षेत्र का विकास उस क्षेत्र की भौगौलिक परिस्थितियों पर निर्भर होता है, आवश्यकता उसे समझने और परखने की है।

(लेखक होम्योपैथी चिकित्सक होने के साथ ही RSS-राष्ट्रीय




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