वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पांडेय के पुत्र की बर्यात में अपनी भाषा में छपवाया आमंत्रण कार्ड
काकटेल को इंकार, भजन-कीर्तन की बही बयार
पारंपरिक रसोई से लेकर तमाम कुमाऊंनी रीति-रिवाज
देवभूमि टुडे
चंपावत। बदलते दौर में जहां शादी धूम-धड़ाका, मौज-मस्ती और काकटेल का पर्याय बनते जा रहे है। वहीं चंपावत के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पांडेय के ज्येष्ठ पुत्र और भाजयुमो के प्रदेश संयोजक गौरव पांडेय की बर्यात (बारात) कुमाऊंनी परंपरा की ध्वजवाहक साबित हुई है। इस समारोह में पाणिग्रहण संस्कार का हर मांगलिक कार्य वैदिक मंत्रों के बीच पूर्ण विधि-विधान से संपंन्न हुए और हर तरह का नशा पूरी तरह प्रतिबंधित रहा।
आमंत्रण पत्र से लेकर हल्दी, मेंहदी, भोज और कथा के कार्यक्रम में कुमाऊंनी रीति-रिवाजों की ही प्रमुखता रही। आमंत्रण पत्र को अपनी बोली भाषा में छपवा कर सबसे पहले श्रीगणेश और ईष्ट देवी-देवताओं के पूजा स्थलों में भेजा गया। ब्या-बर्यात की सभी रस्मों का श्रीगणेश शुगुन आंखर के साथ हुआ। वर को हल्दी लगाने की रस्म रंग्याली पिछौड़ी से सिर ढककर लाने से शुरू हुई।
मेंहदी के आयोजन में काकटेल (नशा) पूरी तरह वर्जित था। डीजे संगीत के बजाय भजन संध्या में भक्ति की बयार बही। रात दो बजे तक महिला और बच्चे भी भक्तिरस में सराबोर रहे। पानी परखने, भाभी के काजल लगाने और मां के दूध के फर्ज अदा करने की रस्मों के साथ कुमाऊंनी ढोल दमू की धुनपर छलिया नृत्य से बर्यात का प्रस्थान और आगमन हुआ। पाणिग्रहण संस्कार के दौरान धुलिग्रह, गोत्राचार, गोठको ब्या, फेरे, शय्यादान, लक्ष्मी नारायण की पूजा वैदिक व पारंपरिक तौर पर संपन्न हुए।
ब्या भात यानि प्रीतिभोज में पारंपरिक रसोई में पंडितों ने भोजन बनाया जिसमें भड्डू की दाल, भात, खीर के साथ स्थानीय व्यंजन परोसे गए। महिला संगीत में वर वधू को पिठ्यां लगाने, दक्षिणा देने और उपहारों का स्थानीय परंपरा के तहत आदान प्रदान करने और श्री सत्यनारायण की कथा के बाद बर्यात संपन्न हुई।पांच दिन बाद दुनगौन की रस्म, ईष्टदेव पंचबलिया में पूजा-अर्चना, देवी पाठ के साथ शादी समारोह का विधिवत समापन हुआ। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी बोली भाषा में छपे आमंत्रण पत्र के साथ ही कुमाऊंनी परंपरा, अपनी संस्कृति सभ्यता को आगे बढाने के प्रयासों को लेकर परिजनों से वार्ता कर गौरव की बर्यात की प्रशंसा करते हुए सरहाना की है।

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