Tuesday May 19, 2026

बातों-बातों में:

भगवत प्रसाद पांडेय

पिछले सप्ताह बाराकोट के सरकारी अस्पताल से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई। 12 वर्षींय एक बच्चे ने रात में यह सपना देखा कि उसे कुत्ते ने काट लिया है। सपना उसे इतना वास्तविक लगा कि जागने के बाद वह घबरा गया। उसने तुरंत मोबाइल उठाया और गूगल पर कुत्ते के काटने पर क्या होता है? और रेबीज के लक्षण जैसी जानकारियां खोज-खोजकर पढऩी शुरू कर दीं। इंटरनेट पर मिली सूचनाओं ने उसके मन का डर और बढ़ा दिया। कुछ ही देर में वह रोने लगा, पेट दर्द की शिकायत करने लगा और घरवालों से बार-बार कहने लगा—मुझे कुत्ते ने काट लिया है। घबराए परिजन उसे तत्काल सरकारी अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने जांच की, लेकिन उसके शरीर पर कहीं भी कुत्ते के काटने या किसी घाव का कोई निशान नहीं मिला। चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने बातचीत के बाद समझ लिया कि मामला केवल एक डरावने सपने और उसके बाद इंटरनेट से मिली जानकारी के मानसिक प्रभाव का है।

बच्चे को खूब समझाया गया कि तुम्हें कुत्ते ने सपने में काट लिया, लेकिन सपने सच नहीं होते। तुम्हें कुछ नहीं हुआ है। चिकित्सक ने बच्चे के घरवालों को भी बताया गया कि कई बार डर, भ्रम और चिंता के कारण शरीर वैसी ही प्रतिक्रिया देने लगता है, जैसी किसी वास्तविक घटना में होती है। चिकित्सकों ने एहतियात के तौर पर मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने की सलाह भी दी।

 

खैर, यह घटना केवल एक बच्चे की नहीं, बल्कि आज के समय की एक बड़ी सामाजिक चुनौती की ओर संकेत करती है। आज बच्चे मोबाइल और इंटरनेट के बेहद करीब हैं। किसी भी सवाल का उत्तर तुरंत गूगल पर खोज लेना उनकी आदत बन चुकी है। नि:संदेह इंटरनेट ज्ञान का विशाल स्रोत है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि वहां उपलब्ध हर जानकारी हर व्यक्ति के लिए सही, पूरी और संतुलित नहीं होती। कई बार अधूरी या भय पैदा करने वाली सूचनाएँ मन में अनावश्यक आशंका भर देती हैं। बच्चों की मानसिक अवस्था अभी विकसित हो रही होती है। वे पढ़ी हुई बातों को जल्दी सच मान लेते हैं। यदि उन्हें किसी बीमारी, दुर्घटना या खतरे से जुड़ी जानकारी मिल जाए, तो वे स्वयं को उसी परिस्थिति में देखने लगते हैं। इसका असर उनके व्यवहार, सोच और स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। कई बार सामान्य सिरदर्द या हल्की परेशानी भी उन्हें किसी गंभीर बीमारी का संकेत लगने लगती है।

मोबाइल और इंटरनेट निश्चित रूप से उपयोगी साधन हैं। पढ़ाई में भी इसका महत्व है लेकिन बच्चों के लिए इनका प्रयोग निगरानी और मार्गदर्शन के साथ होना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल उपयोग पर ध्यान दें। उनसे संवाद बनाए रखें और यह समझाएं कि इंटरनेट पर लिखी हर बात अंतिम सत्य नहीं होती। स्कूलों में भी डिजिटल जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर नियमित चर्चा होनी चाहिए। यह तकनीक जितनी उपयोगी है, उतनी ही संवेदनशील भी। जानकारी यदि समझदारी से ग्रहण न की जाए, तो वह ज्ञान कम और भय अधिक पैदा कर सकती है। इसलिए समय की आवश्यकता केवल बच्चों को मोबाइल चलाना सिखाने की नहीं, बल्कि सही और गलत जानकारी में अंतर समझाने की भी है।

(लेखक बाल साहित्यकार और राजस्व विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी)




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