देवभूमि व्यंग्यबाण-6
बात कहां से शुरू की जाए? लिखा क्या जाए? बोला क्या जाए? अब क्या कुछ लिखने-बोलने को बचा भी है? जादातर जो लिख रहे हैं, वे क्या लिख रहे हैं, किसके लिए लिख रहे हैं, किसके कहने पर लिख रहे हैं? अब ये सवाल बचे ही नहीं। सबको इनके जवाब पहले से ही मालूम हैं। चलिए, इस बात को यहीं विराम देते हैं। आगे बढ़ते हैं।
बात बहुत पुरानी नहीं है। अप्रैल फूल जैसे लग सकती है। लेकिन अप्रैल फूल की है न अप्रैल महीने की। एक सवाल निकला, सवाल करने वाले को छोड़ सब सन्न। हंसे या रोए। सिर पीटे या माथा। कुछ समझ नहीं आया। आना भी न था। सवाल ही कुछ ऐसा था। सवाल सुनने वाले महाशय भी निरुत्तर थे। हो भी क्यों न। सवाल था कि क्रिकेट के मैदान में कोई सधी गुगली? हो चाहे जो भी। लंबे सियासी सफर में ऐसे सवाल से उनका सामना कभी हुआ भी न था। बस मुस्करा कर आगे निकल गए। किसी ने ठीक ही कहा कि हर सवाल का जवाब नहीं होता, चुप्पी ही लाजवाब जवाब होता है।
कलमकारों का कमाल तो लोग खूब देख और पढ़ ही रहे थे। अब मामला कमाल और कमल से आगे कीचड़ तक जा पहुंचा था। ये ऐसा दलदल था, जिसमें नहीं कूदने वाले भी धंसते चले जा रहे थे। इस धंसाव से बचाव का भी कोई इलाज भी फिलहाल तो नहीं सूझ रहा! कुछ कहने लगे कि कलमकारों की कम्युनिटी का नया आभूषण बन गया है ये कीचड़। कुछ कह रहे हैं कि ये तो होना ही था। जो हुआ सो हुआ। जो गिरे वे गिर कर उठेंगे या बेसुध गिरे ही रहेंगे? यानी कि एक सवाल के बाद सवाल ही सवाल, चारों तरफ से सवालों की बारिश।
मगर इन सबके लिए कौन है जवाबदेह? किसकी है जिम्मेदारी? ऐसे ही बेड़के सवाल करेंगे, तो सवाल करने वाले पर या किसी एक पर सवाल नहीं उठेगा, बल्कि कटघरे में वे सब भी होंगे, जिन्होंने न ये सवाल किया और जो वाजिब और सधे सवाल करने की काबिलियत रखते हैं। उन्होंने ऐसे हालात ही क्यों बनने दिए कि कोई भी आ जाए और वीवीआईपी के आगे खड़े हो कुछ भी बोल जाए! कौन रोकेगा ऐसे अनर्गल सवालों को? कोई कुछ करेगा, इसकी आस कम ही है। क्योंकि कम से कम इस क्षेत्र में तो ऐसी किसी संहिता को लोग न जान रहे हैं और नहीं मान रहे हैं। क्या लिखें, क्या बोलें, क्या छापें, क्या दिखाएं। इस कसौटी का अब कोई अर्थ ही नहीं रहा। ज्यादातर तो सही-गलत को तौले बगैर अपनी पसंद और सुविधा के हिसाब से ही कलम चला रहे हैं। तो ऐसे में, आगे फिर कभी ऐसे सवाल उठे, तो कृपया चौकिएगा मत। बस हंस दीजिएगा सवाल करने वाले पर नहीं खुद पर! क्या हालत बना दी है!
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