कमाल का जलसा गजब की महफिल
व्यंग्य बाण
जलसे में न्यौता क्या मिला। मिला या खुशामद कर लिया। हो जो भी, पर इस जलसे से बांछे खिल गई। खूब मौज होगी, ये सोच खूब लार टपकती रही। और वह दिन भी आ गया, जब महफिल जमनी थी। महफिल तक पहुंचने के रास्ते भर भी महफिल के सूरमा खूब छके। महफिल में खूब हुआ खान-पान। खान से ज्यादा हुआ पान। तोहफे पाए, सो अलग। खूब छकने के बाद फिर तारीफों का दौर चला। सुध हो या न हो, पांव जमीन पर टिक रहे हो या लडख़ड़ा रहे हो, बोल फूट रहे हो या जुबान लड़खड़ाती रही, लेकिन फिर भी बोलने का जज्बा कम न था। ऐसे रणबांकुरों को सलाम।
फील गुड के एहसास या कहे कि मेजबानों के एहसान के बाद सबने एक स्वर में कहा सब कुछ हराभरा है। रंग चाहे जो भी हो, चश्मे का रंग जो बदल गया था। अब कौन समझाए कि पढ़ाई, दवाई और कमाई तो आनी-जानी है, असल मामला तो रंगत का है। होली के रंग में जब एक और रंग मिल जाए तो बात गाढ़ी भी होगी और निराली भी। और फिर ये कोई जलसा मामूली भी तो नहीं था। उनके लिए था, जो दूसरों की खबर लेने का दावा करते हैं। भले ही जलसे में उन्होंने क्या किया इसकी खबर न रही हो! इससे क्या फर्क पड़ता, किसको पड़ता, कितना पड़ता? अगर पड़ता, तो वे ऐसा नाच करते ही क्यों? वैसे चुनाव में वक्त ही कितना है, ऐसे जलसे, ऐसी महफिल नाम, जगह और रंग बदलकर अपने रंग बिखेरती रहेंगी और जलसे में शामिल हुजूम रंगत उड़ाते रहेंगे बेफ्रिक और निश्चिंत होकर।
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