Tuesday Mar 10, 2026

व्यंग्यबाण...

देवभूमि टुडे

रंगों का पर्व निपटा। शांति से जरूर निपटा, लेकिन जाने से पहले कई रंग दिखा गया। 'बुरा न मारो होली है' के उल्ट काफी कुछ ऐसा भी हुआ, जो सामान्य समझ रखने वाले किसी भी शख्स को जरूर बुरा लग सकता है। लेकिन कितने लोगों को बुरा लगा या नहीं लगा, यह तो नहीं पता।

तफसरा का आगाज कहां से किया जाए? होली का पर्व तो था ही, बीते एक पखवाड़े में एक जलसा भी हुआ। चमचमाते पहाड़ी जिले के मैदान में हुए कई दिनों के जलसे में कलमकारों ने खूब मौज काटी। रहने, खाने और यहां तक कि प्री-लंच/डिनर इंतजामात भी था। ज्यादातर लोगों ने खूब छक कर उदर पूर्ति की। मेहमाननवाजी से गदगद लोगों ने मेजबान की तारीफ में कसीदे गढ़े। आयोजन की सच्ची-झूठी खूब प्रशंसा भी हुई। मेजबानों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। समापन से पहले सम्मान से भी नवाजे गए। मगर इस जलसे में भी कुछ ऐसा हुआ, जिसकी आज तक चर्चा हो रही है।

 

इस जलसे के बाद एक और जलसा हुआ रंग से सराबोर जलसा। मैदान-पहाड़ का समागम हुआ। तादात भी खूब थी। ऐसे भी कई सूरमा थे, जिनकी ज़ुबां हलक तर किए बगैर नहीं खुलती थी। उनके लिए 'खास' बंदोबस्त किया गया था। रंगीन माहौल के बाद उपहार की रस्म अदा हुई। इस रस्म के भी रंग कम निराले नहीं थे। कुछ ऐसे महाशय थे, जिनके दोनों हाथों में 'लड्डू' थे, तो इक्का-दुक्का ऐसे भी थे, जो खाली हाथ थे। हाथ में जो था, वह नजर बचते ही कोई और ले उड़ा। कई ऐसे भी थे, जो अपने-अपने चहेतों को भी न भूले। लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिनकी किसी को सुध तक न थी। बहरहाल जलसा बीता, बधाई का दौर पूरा हुआ। कमलकारों के अरमानों के पंख आसमान में उड़ रहे थे। नजरें अगले जलसे पर है। पैनी धार की जगह डिक्टेट होने वाले ये 'कलमकार' हैं या 'कमलकार'? खुद उन्हें नहीं पता, मगर उन सबको उनके डबल रोल की भलीभांति जानकारी है।




Share on Facebook Share on WhatsApp

© 2026. All Rights Reserved.