देवभूमि व्यंग्यबाण-9
माननीय...श्री ने खेल मैदान का निरीक्षण किया। उनका निरीक्षण खेलों के विकास और खिलाड़ियों के मनोबल को बढ़ाने में अहम है। मोबाइल में आए श्री... के दौरे के मैसेज को एक कलमकार पढ़ ही नहीं रहा था, रुबरु लिख भी रहा था। वैसे ऐसे वाकयों में किसी एक का पेटेंट नहीं है, किसी एक की बपौती भी नहीं है, बल्कि इसमें कई हाथ है और कइयों का साथ है। हम सब एक हैं, हम सब साथ हैं... की तर्ज पर कई कलमकार कंधे से कंधे मिलाकर चल रहे थे। एक जैसा कदमताल, एक जैसा कलम की चाल। रत्तीभर भी फर्क नहीं। न लिखने में, न पढ़ने में न कसीदे गढ़ने में। कलम की गजब की ऐसी चमकदार लिखावट कि हर कोई हैरान हो जाए। स्तुति गान हो, तो ऐसी! चंदरबरदाई या कोई दूसरा राग दरबारी क्या करेगा मुकाबला!
हर तरह, जहां तक नजर जाए। कभी कहते थे कि जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि (पत्रकार)। मगर अब कहावत बदल गई है। जहां जरूरत हो वहां न जाए मीडिया और जहां जाए वहां दिखे हरियाली ही हरियाली। मौसम चाहे कोई हो, लेकिन उसे दिखता है हरा ही हरा। बेशक मौसम सावन का न हो लिखने वाला भी अंधा न हो। लेकिन क्या फर्क पड़ता, वह खुद क्या वह कह पा रहा है या लिख पा रहा है या देख पा रहा है, जो हो रहा है। एक चश्मा आंखों में है, जो न गर्मी का है और न आंखों की रोशनी के लिए, बल्कि ऐसा चश्मा है, जो वह दिखाता है जो होता नहीं। वह दिखाता है जो सच नहीं होता। वह दिखाता है सब चंगा सी। हर तरफ हरियाली, हर मौसम गुलाबी!
किसी अकली ने हिम्मत कर पूछ ही डाला। हुजूर, आपकी कलम का कमाल है कि खूब रोजी बरस रही है। आपका लिखा ही तो पढ़ा कि काम की खूब बरकत है! हमारे घर में भी बच्चे हैं, तालीम पूरी कर ली है, लेकिन घर बैठे हैं। काम मिले, इसके लिए खूब पसीना बहा रहे हैं, लेकिन पसीने को कामयाबी के पंख नहीं लग रहे हैं। अभी तक न कोई रोजी है न रोटी का कोई जुगाड़। आपने ही तो बताया कि विकास को रफ्तार देने के लिए सैकड़ों हाथ काम में जुटे हैं। कोई हाथ खाली नहीं है। बस इन नन्हें हाथों पर भी नजर इनायत कर दें हुजूर। ठीक है वे ज्यादा पढ़े हैं, फिर भी बड़ा काम न सही, छोटा काम ही, दिला दें हुजूर। बड़ी मेहरबानी होगी हुजूर। माननीय...श्री मार्का लिखने वाले कलमकार को काटो तो खून नहीं। बस किसी तरह पल्ला झाड़ा और इज्जत बचाई।
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