देवभूमि व्यंग्यबाण 8
अजब कलम गजब की कार
कलम भले ही न चल रही हो, कार तो खूब मार रही है फर्राटा
वे सरकार नहीं हैं, लेकिन फिर भी बे-कार नहीं हैं। उनके पास कार है। कार से ही चलते हैं। साथ में कलम है, तो हो गए न कलमकार! कलम का उपयोग करने की भले ही उन्हें फुर्सत न हो, लेकिन कार का जमकर करते हैं। जहां कहीं जलसे, समारोह, मेले-ठेले हो, मजबूत मौजूदगी में सबसे आगे। मजाल है, जश्र के ऐसे माहौल की शोभा बनने से चूक जाएं! हर जगह हर कार्यक्रम में नियमित और समय से पहले विराजमान होते हैं। ठीक है उन कार्यक्रमों में भी कलम चलाने की तकलीफ न करते हों, लेकिन समारोह का पूरा लुत्फ उठाते हैं।
ऐसा ही एक वाकया एक ..कार के साथ हो गया। धार्मिक मेला चल ही रहा है। धमक गए वहां। हम ..कार हैं, हमारी कार चलनी हैं। हर हाल चलेगी। जब इतनी टैक्सी-जीप-कारें चल रही हैं, तो एक इसी ने क्या बिगाड़ा? उन्होंने सवाल दागा? सवाल ही नहीं दागा, जवाब भी दे डाला। देखते हैं कि कौन रोकता है, कैसे रोकता है? बात बनाने के लिए सवाल और जवाब दोनों एक साथ दागे गए। लेकिन जवाबी कार्रवाई भी कम नहीं थी। जवाब देने वाले ने भी दो-टूक कह दिया, जो होगा सबके लिए एक से कायदे एक से कानून होंगे। किसी के ..कार या बे-कार होने के चलते नियम या रवायत में बदलाव नहीं हो सकेगा। सब नियम से और नंबर से चलेंगे। जिसका जब नंबर आएगा, तब चलेगा।
बे-कार की बात यहीं तक। अब काम की बात करते हैं। फिर कार के लिए ईंधन भी चाहिए। डीजल-पेट्रोल का क्या होगा? कैसे होगा? इसकी खरीद के लिए रोकड़ा चाहिए। चलिए कलम तो है, भले ही जनता के दुख-दर्द को बताने, उसके समाधान के लिए न चलती हो, कोई बात नहीं। ईंधन के जुगाड़ के लिए तो चलनी चाहिए! मेला चल रहा है, तो दान-दक्षिणा तो चाहिए न! इसी का जुगाड़ कर लिया जाए। बात की, लेकिन बात बनी नहीं। उन्होंने तो उस कलम का लिखा कभी पढ़ा था, न कलमकार का नाम सुना था। ये हाल हैं ..कारों के! ऐसे ..कार जो कलमकार हैं या चाटुकार? फर्क करना कोई पहेली नहीं। सब जानते हैं। लेकिन ऐसे ही ब्रिगेड से कलम की धार गायब है।
कलम का लिखा बे-दम हो रहा है, साख पर बट्टा लग रहा है। लेकिन इसकी परवाह किसे? ज्यादातर ..कार कहते हैं कि ये तो सबकी दरकार है, सिर्फ ..कार की नहीं? तो इसमें श्याम-श्वेत का रंग क्यों देखना? तभी तो पत्रकारिता काले-सफेद, सही-गलत, पीत-पतित की परवाह नहीं करती? इसिलिए लोगों का विश्वास भी कम ही नहीं हो रहा है, टूट ही नहीं रहा है, बल्कि चकनाचूर हो रहा है। तो ऐसे में किसे परवाह है कि इस टूटे आयने को फिर से जोड़ा जाए? कई संगठन हैं, जो काम के लिए नहीं नामभर के लिए हैं। कहते हैं कि बहती गंगा में हाथ धोना... की कहावत यूं ही थोड़ी बनी है। बहती गंगा में हाथ धोने से लेकर नहाने तक में क्या बुराई है। ऐसे में अगर कलमकार की कलम का तिरस्कर हो रहा है, तो इसमें क्यों किसी को हैरानी हो? यह तो होना ही था!
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