कमाल की कलम...लिख पा रही न देख पा रहीं
देवभूमि व्यंग्यवाण
जंग खाड़ी में हो रही है। इजराइल और यूएसए ने ईरान पर हमला किया है। दोनों ओर से हमले, जवाबी हमले और प्रति हमले हो रहे हैं। दोनों तरफ नुकसान हो रहा है। असर दुनियाभर पर पड़ रहा है। इस युद्ध का असर लोगों की चौका-चूल्हे तक है। वे कतार में हैं। ऐसी कतार तो खैरात बंटने में भी नहीं लगती। जरूर कभी एटीएमों में लगा करती थी। और अब फिर से लाइन में खड़े होकर लंबा इंतजार कर रहे हैं। तपिश में पसीना-पसीना हो रहे हैं। बारिश में भीगने के बाद भी कतार से टस से मस नहीं हो रहे है। बस एक ख्वाइश, किसी तरह अपने मकसद में कामयाब हो जाए। जिस लिए आए, वो हासिल हो जाए। डिमांड-सप्लाई में अंतर नहीं है, कहा जा रहा है। मगर हालात क्यों नहीं संभल रहे हैं, ये पहेली बनी है, एक अबूझ पहेली।
ऐसी ही एक और पहेली बनी है कमाल के कलमकारों की कलम। जो चल नहीं पा रही है। कागज को भरने के लिए यूं तो जो मिलता था, सही-गलत, ताजा-बासी इन सबसे बेपरवाह वे बेहिचक-बेझिझक भर देते थे। मगर इन हालातों में उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। क्यों किए, किस लिए किए ये तो या तो वे जाने या राम जाने। जनता की परवाह, किसे है, किसे नही, किसी को है भी या नहीं, इसमें तो अब कोई पर्देदारी भी नहीं रह गई है। लेकिन इतना जरूर समझ आया कि जिनमें धृतराष्ट्र बनने का साहस-दुस्साहस हो, वे ही ऐसा करने की हिम्मत या कहें हिमाकत कर पा रहे हैं।
एक किस्सा है एक कलमकार से जुड़ा। उनके मोहल्ले में लंबी कतार थी, कलमकार से तस्वीर के लिए कहा, तो उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। छपना-छापना-छुपाना तो दूर, किसी दूसरे के लिए भी एक क्लिक करने की हिम्मत नहीं है। तो समझ सकते हैं कि ये कैसी कलम है, जो न चल पा रही है, न लिख रही है और नहीं लोगों की तकलीफ, उनकी परेशानी को बता पा रही है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है, ये तो राम जाने, मगर लोग ऐसे काले-सफेद कलमकारों को खूब गरिया रहे हैं, जो जानते-बुझते, देखते-समझते नादान बने हैं या नालायक? फिर भी खुद की कलम को कमाल का बता रहे हैं लेकिन लोग उहें कमल नहीं कीचड़ से सना कह रहे हैं!
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