कलम की हिफाजत नहीं फिर भी कलम के सिपाही
देवभूमि व्यंग्यबाण-18
उन्हें गुमान था कि वे कलम के सिपाही हैं, ये भ्रम उन्हें कलम की हिफाजत के बगैर भी था। सबकी खबर लेने और सबको खबर देने में उनकी दिलचस्पी भले ही न रही हो, लेकिन लोगों से कलमकार कहलवाना खूब पसंद था। लेकिन झूठी ही सही उनकी ये घफलत भी तार-तार हो गई। जब उन्हें एक दिन ज्ञान हुआ कि वे कलमकार नहीं हैं, बल्कि वे तो अराजक हैं। जी हां, अराजक। नए दौर के नए नाम से वे नवाजे गए। ये उनका नया नामकरण हुआ है। किसने किया? कब किया? क्यों किया?
ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब एक मुखिया ने हर तरफ से थकहार अपने स्रोत से ही लोगों के भले के लिए एक काम करा दिया। उस काम में उनकी गांठ का रोकड़ा लगा। इस नेक काम की भनक लगी, तो डिजिटल से लेकर प्रिंट तक सबने खूब वाहवाही की। बस फिर क्या था! कइयों को ये तारीफ नागवारा गुजरी। तो उन्होंनें वाहवाही करने वालों को अराजक का तमगा दे दिया। झूठ फैलाने वाते, भ्रमित करने वाले। बाकायदा लिख कर ये सब बताया गय। नया नामकरण किया भी उन्होंने, जिनका काम इसी तबके से कॉर्डिनेट करना था।
नया नामकरण हुआ, तो कई ऐसे भी थे, जिन्हें इसमें कुछ भी नागवारा नहीं लगा। इसमें ढेरों कलमकार ही नहीं, कलम के खैरख्वा बनने वाले ग्रुप भी थे, उनके कई रहनुमा भी थे। कई तो इस नई पदवी से गदगद भी थे। आखिर ऐसा हो भी क्यों न! शायद वे इसी टाइटिल के सच्चे हकदार हो। कुछ ने कहा कि कलम के ऐसे झंडाबरदार पहले चरणवंदना करते थे, स्तुतिगान करते थे, आकाओं की आरती उतारते थे। ऊपर वाले के सम्मुख भले ही नतमस्तक न होते हों, लेकिन ऊपर वालों की कृपादृष्टि के लिए भजन करने में उनका कोई सानी न था। शक्ति की भक्ति में उनका खूब यकीन था। इतने तमाम तमगे तो पहले से उनकी झोली में थे। और अब अगर एक नया सम्मान अराजक के रूप में मिला हो, तो इसमें कुछ भी असामान्य कैसे? अब ऐसे ही कलमकारों को अगले नामकरण का इंतजार है। अगर यही हाल रहे, तो उनकी ख्वाहिश पूरी होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा!
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