देवभूमि व्यंग्यबाण-17
जलसा बड़ा था। हुजूम भी खूब था। आयोजन में कोई कमी नहीं थी। चारों तरफ वाहवाही हो रही थी। जाहिर है कार्यकम भव्य था, तो ..कार भी थे। जलसा भले ही पहाड़ में न था लेकिन ..कारों को जाना पहाड़ को ही था। गर्मी के बीच कई ..कार कागज-कलम लेकर जमीं पर उतरे। कार्यक्रम निपट गया था। सब कुछ ठीक चल रहा था। तभी एक ऐसा वाकया हुआ जिसने सब किए-धरे पर पानी फेर दिया। सारी मान-प्रतिष्ठा, गरिमा, मर्यादा सब तार-तार हो गई।
..कारों को भले ही विश्व कप फुटबॉल में दिलचस्पी हो या न हो, फुटबॉल खेली हो या न खेली हो, लेकिन अब वे खुद ही फुटबॉल बन चुके थे। कभी इस पाले, तो उस पाले। कुल जमा एक जगह से दूसरी जगह, फिर तीसरी। नौबत विवाद की आ गई। ये मौसम की गर्मी थी कि माहौल की या किसी ओर की, लेकिन अब बारी थी आपस में ही शास्त्रार्थ करने की। खूब हुआ शास्त्रार्थ, खूब चले शब्दभेदी बाण।
..कार समाज को कहां तो सत्कार और पुरस्कार की आस थी, मामला तिरस्कार और बहिष्कार तक पहुंचने लगा। फिर तीन बार इधर-उधर से गरियाए जा चुके ..कारों को अंतत: बड़ी कामयाबी मिली। चौथी जगह उनकी मुराद पूरी हुई। इस कामयाबी को पाने के लिए उन्हें भीषण गर्मी के बीच परिक्रमा करनी पड़ी।
लेकिन ये परिक्रमा किसी धर्मस्थल की नहीं, किसी मशहूर शख्सियत की नहीं, बल्कि एक शहर की थी। एक कोने से दूसरे, एक रोड से दूसरी। फिर जाकर नसीब हुआ वह लक्ष्य, जिसके लिए ये पूरा तमाशा हुआ। ऐसे में किसकी साख बचेगी? कितनी बचेगी?कितनों की साख पर बट्टा लगेगा? किससे सवाल करेंगे? कैसे सवाल करेंगे? कितने मुकम्मल जवाब मिलेंगे? सब नेपथ्य में। इस फुटबॉल मैच सरीखे संघर्षपूर्ण मुकाबले में एक महकमा भी था, जो अ-सरकारी कतई नहीं था। ..कारों ने फजीहत झेलने के बाद उस अमले पर भी खूब हमले बोले।
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