देवभूमि व्यंग्यबाण-15
कुछ कह रहे थे कि वे गोद में बैठे थे, लेकिन कई लोग इससे सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि वे बैठे नहीं थे, बल्कि दंडवत थे। जैसे किसी आराध्य के सम्मुख कोई भक्त नतमस्तक होता है। ठीक वैसे ही जैसे 1975 के दौर में चरणवंदन कर रहे थे। सही राम ने पूछा कि गोदी में तो शिशु बैठता है, बच्चा बैठता है। वे अबोध होते हैं। नादान होते हैं। अपने-पराये के व्याकरण से दूर होते हैं। तो जो बच्चे नहीं हैं, वे क्यों गोदी में हैं? इस सवाल को सुन नेक लाल ने ठंडी सांस ली, कुछ देर ठहरे। फिर कहा-ध्यान से सुनो। तुम्हें क्या लगता है कि उम्र में अधिक दिखने वाले गोदी में बैठे ये लोग क्या अबोध नहीं है? बच्चा तो भोलेपन में अबोध होता है, लेकिन ये शातिर जानते-बुझते अबोध बने हैं। ताकि मिल जाए किसी की गोदी और सध जाए अपना उल्लू। नेक लाल बोलता जा रहा था कि देखो ये ...कार हैं और खुद को दूसरा ...कार समझते हैं। नहीं खुद को खुदा भी मान बैठे हैं। सही राम ने पूछा कि उन्हें ..कारों की भीड़ में पहचानेंगे कैसे?
नेक लाल जोर से हंसा और बोला तुम बहुत नादान हो। भीड़ में उन्हें नहीं पहचानना है। भीड़ में वे ही नजर आंगे। उनकी तो अपनी पहचान पहले से ही है। वे खूब नामी होंगे, लेकिन अपने काम से नहीं, चारण-भाट गिरी से। सावन के अंधे की तरह हर जगह हराभरा देख रहे हैं और दिखा रहे हैं। सही-गलत में कोई दीवार नहीं। सबकी जयकारा करेंगे। जलसे-जश्र में हर सार्वजनिक मंच पर झूठी-सच्ची तारीफ गढ़ेंगे। जलसे कराएंगे, जलसे में उन्हें ही बुलाएंगे, जो जलसा कराने में मददगार बनेंगे, खूब वाह-वाही करेंगे। ये ज्ञान सुन सही राम ने कहा कि आप ज्ञान के भंडार हैं। आपको दुनिया का अपार अनुभव है। बदलते दौर, बदलते वक्त, बदलते मिजाज, बदलते हालात को खूब समझते हैं। आपकी महिमा अपरंपार है। आपको नमन कह सही राम ने अपनी राह नापी।
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