Monday Jul 20, 2026

देवभूमि व्यंगबाण-14

कहावत है कि अंधा बांटे रेवड़ी। इसे पिछले हफ्ते चरितार्थ किया गया एक सालाना जलसे में। नाम किसी का काम किस का और इनाम किसी को की तर्ज पर नामों में उल्टफेर होता रहा। कुछ जरूर पात्र थे मगर पात्र से ज्यादा अपात्र और कुपात्रों ने रेवड़ी का स्वाद चखा। दोनों कृतार्थ। देने वाला भी और लेने वाला भी। लेकिन स्वाद केवल रेवड़ी का ही नहीं चखा। खान के साथ सचमुच का पान हुआ, बल्कि साथ नहीं पहले, रात नहीं दिन दहाड़े। कई तो ऐसे भी थे, जो चलने से मंजिल तक पहुंचने तक तर थे। कोई हिचक नहीं कोई झिझक नहीं। मर्यादा का तो खैर कहना ही क्या। वह तो तार-तार पहले ही हो चुकी थी।

 

देश में उपदेश की कमी नहीं, तो यहां भला कैसे होती! काम भले ही बड़े न सही छोटे भी न हो लेकिन बड़ी बातों से कोई पीछे नहीं। अच्छा मजमा जुटा। महफिल भी लुटी। बाहर से आए मेहमानों ने सैरसपाटा कर घर वापसी की। किसी की पिकनिक पूरी हुई, तो कइयों के अरमान। लेकिन इससे मान किसी का नहीं बड़ा। न उन मुद्दों पर मंथन जिसके लिए ये जलसा था। एक साल में क्या पाया, क्या पाना है, बेहतरी के लिए कदम कैसे आगे बढ़े? इन सब पर सन्नाटा। शोर और जोर किसी और का था।

ऐसे कारनामों को जान किसी ने पूछा क्या ..कारों का जलसा ऐसे ही होता है, ऐसा ही होता है? तो क्या वे आयना देखते होंगे और सिस्टम के सच का समाज की वास्तविकता का कौन सा आयना दिखाते होंगे? मासूम सवाल था लेकिन इस मासूम सवाल का कोई जवाब नहीं था। जब जवाब न हो तो उत्तर सबको पता होता है!




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