Monday May 25, 2026

देवभूमि व्यंग्यबाण-13

क्या लिखें, क्या पढ़़ें, क्या दिखाएं, क्या बताएं? एक मासूम ने पूछा। दूसरी तरफ से पलट कर जवाब मिला कि जो पढ़ें उसे न लिखें, जो दिखे उसे न दिखाएं न लिखें। कहा तो जाता है कि कलम का कर्म और धर्म जो जैसा है, उसे वैसा बताना, दिखाना है। ठीक कैमरे की तरह। फिर ऐसा क्यों? घाट-घाट के पानी का स्वाद चखने वाले ने कहा कि धर्म और कर्म तो देश-काल के हिसाब से बनता-बिगड़ता है। समझदार सदैव इस फलसफे को जानते भी हैं और मानते भी। मासूम ने फिर पूछा तो क्या शाश्वत नियम सच नहीं? समझदार ने फिर समझाया कि शाश्वत नियम तो है, लेकिन क्या अपवाद नहीं होते है? इसे ऐसा ही अपवाद समझो, बल्कि समझ लो कि अब अपवाद ही नियम हो गया। बस इतना भर समझो, ज्यादा सवाल-जवाब का कोई फायदा नहीं।

 

मासूम ने कहा-बस एक आखिरी सवाल। ज्यादातर कलम किसी भी वाजिब मुद्दों पर सही और एक जैसा क्यों नहीं लिखती? क्या वे बहुत अकलमंद, विचारवान और आदर्श के पक्के होते हैं या कुछ और? समझदार ने कहा बंद करो सवाल। अब सुनो-तुम सचमुम मासूम हो मासूम ही नहीं, अकलहीन भी हो। जो समय की गति और जमाने की दुर्गति को नहीं भांप पा रहे हो। आज कलम चलाने के लिए न अकल की जरूरत है, न विचारों की न सिद्धांतों की न सही-गलत में फर्क करने की और न पढ़ने या जानने की। बस  जो दिखे वो न दिखाएं और न लिखें। ये सीधी-सादी, सरल, सपाट राह है। जो इस राह पर चलें, उसकी राह आसान। मंजिल और मुकाम मिलना भी तय। और जो न चलें? मासूम ने हिम्मत कर फिर पूछा, तो समझदार ने डांट कर चुप करा दिया। कहा कि तुम दीन-दुनिया से बेखबर हो, पहले दुनियादारी सीखो और समझो। तब न कोई सवाल करोगे और न किसी से जवाब मांगोंगे। इतना सुन वार्तालाप पूरा हुआ। मासूम की सारी जिज्ञासाएं शांत हो चुकी थीं। दोनों अपने-अपने रास्ते चल दिए।




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