Tuesday May 19, 2026

देवभूमि व्यंग्यबाण-12

मीडिया के क्या हाल हैं? यह सवाल नहीं है, इस सवाल में ही जवाब भी है। कौन बेहाल है, कौन निहाल है? बड़ा तबका निहाल है। कलम का कमाल दिखाने में ज्यादा कसरत भी नहीं करनी पड़ती। क्या लिखना है, क्या पढ़ना है, क्या पढ़ाना है, क्या दिखना है क्या दिखाना है? इसे लेकर भी कोई मशक्कत नहीं करनी है!

 

कलम से जुड़ा एक वाकया पेश है। बात एक जलसे की है। जलसे में उल्लास भी खूब था, हुजूम भी खूब था, पूरे रंग में पूरे शबाब में थी महफिल। तभी एकाएक कुछ ऐसा हुआ कि हुजूम में हलचल मच गई। अफरातफरी मच गई। लाठी भी चल गई। इतना सब हुआ। प्रिंट ने छुपाया नहीं छापा। ये काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन पूरा नहीं आधा सच और आधा झूठ। लगता है कि कलम चलाने वालों को रात के अंधेरे में लाठी चलाने वाले नहीं दिखे। दिखे नहीं, तो लिखे कैसे, लिखा नहीं, तो पाठक पढ़ेंगे कैसे? जो हुआ, उस वाकये को कलम ने अपने चश्मे से देखा और लोगों को पढ़ाया भी आधा सच।

एक और वाकये के साथ इस अध्याय की इतिश्री करते हैं। कलम कैसे दलदल में धंसी है, फंसी है, इसे भी बूझते हैं। एक अफसरान है, बहुमुखी प्रतिभा वाले हैं। जिस काम के लिए जिम्मेदार हैं, उस पर बात कम करते हैं, जाहिर है काम भी कम करते हैं! मन इस काम में कम रमता है, ऐसा कहने वाले कहते हैं। पिछले दिनों अपने ऐसे ही एक बहुमुखी हुनर के चलते छाए रहे थे। लोगों ने हाथोंहाथ लिया। कीचड़ में कमल खिला खुशबू बिखेरने के लिए कलम का साथ लिया। जलसे के बीच महफिल सजी भी और जमी भी। काम हो न हो, जैसा भी हो चलेगा, क्योंकि दिखेगा वह जो है नहीं और जो वाकई है वह दिखेगा नहीं! इसे लेकर अब प्रतिभा के धनी मुत्तमिन हैं।




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