देवभूमि व्यंग्यबाण-11
पिछले हफ्ते एक वाकया हुआ। शर्मसार करने वाला, झकझोरने वाला। समाज को भी सिस्टम को भी। देवभूमि की नैतिकता और शुचिता की तो बात ही क्या करें! अब इसकी फिक्र कितने लोगों को हैं। एक नहीं अनेक प्रकरण इस पुण्य भूमि में हो चुकी है। हर वाकये के बाद कुछ विरोध में और ज्यादातर बचाव में नजर आते हैं। बिना ये देखे कि घटना क्या है, कितनी जघन्य है, कितनी संवेदनशील है?
इन सबसे बेफ्रिक सबकी अपनी-अपनी लाइन। एक तबका शोर मचाता है। ठीक वैसे ही जैसे नक्कारेखाने में तूती बजाने जैसे। दूसरा तबका उससे अधिक ताकत और अधिक जोर से शोर मचाता है। और उस शोर में पहली आवाज दब जाती है। सत्य और तथ्य पर चर्चा भी इसी शोर-शराबे की भेंट चढ़ जाती है। घटनाओं को देखने, उस पर राय रखने के लिए एक ही चश्मा।
वारदात कहां हुई, किस राज्य में हुई, उस राज्य में सरकार किसकी, घटना को अंजाम देने वाले कौन? ऐसे तमाम सवालों के बाद ही क्रिया-प्रतिक्रया का पैटर्न सामने आ रहा है। इससे कोई सरोकार नहीं कि घटना कितनी खौफनाक है, जघन्य है, समाज को भटकाने वाली है, सिस्टम को हिला देने वाली है, लोगों को रूला देने वाली है? बस अपना-पराया का नजरिए इन सब पर भारी।
कमोबेश ऐसा ही कुछ एक हालिया मामले में भी हुआ। मुद्दा इतना शर्मसार करने वाला कि गूंज हर तरफ, चारों तरफ। शहर से गांव तक, जिले से सूबे तक और प्रदेश से देश की राजधानी तक। सुर्खियों में आने वाले इस मामले से हर कोई सन्न। पक्ष और विपक्ष दोनों आमने-सामने। ठीक ऐसे ही लोग भी आमने-सामने। क्या हुआ, कैसा हुआ? इसे जानने में दिलचस्पी कम चटखारे लेने में ज्यादा। .
हर और अपनी-अपनी दलील, अपने-अपने तर्क, सही-गलत से ऊपर। शुरुआत में जो हुआ और बाद में वह नहीं हुआ। दोनों बातों को लेकर जो कहा गया जो नहीं कहा गया, जानकार अचंभित हैं। उनके अपने सवाल हैं, जिनके जवाब उन्हें भी चाहिए और लोगों को भी।
आखिर में एक सवाल। कलमकारों से। ऐसे वाकयों को कवर करने में जो संजीदगी, जो संवेदना, जो समझ चाहिए, वह भी ज्यादातर जगह गायब दिखी। कई जगह वो सब भी दिखाया, बताया और सुनाया गया, जो कायदे में नहीं दिखाया जाना चाहिए। ऐसा हो भी क्यों न? जब देखने के लिए आयना न हो, लिखने वालों ने पढ़ना बंद कर दिया हो, समझना बंद कर दिया हो, सवाल करना बंद कर दिया हो, तो फिर इसमें हैरानी कैसी?
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