Sunday May 3, 2026

देवभूमि व्यंग्यबाण-10

बात किसी एक दौर की नहीं है। हर दौर में अमूमन ऐसा ही होता आया है। सच-झूठ, सही-गलत, पुरस्कार- तिरस्कार जैसी स्थितियां बिना देखे बिना जांचे बिना परखे लिखी और कही जाती रही है। नए दौर में ये नौबत कुछ ज्यादा है। द्रुत गति से है, कसौटी में कसे बगैर है। दरसल अधिकांश कलमकार अब चंदरबरदाई के अनुगामी हो गए है। वैसे कलम के करामातियों के केवल दो ही पंथ है या तो महिमामंडन या तिरस्कारी खेमा। बीच का कोई रास्ता नहीं। दरअसल ये दोनों रास्ते 'कहीं खाई तो कहीं कुआं' वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। मगर सही लिखने से पहले पढ़ना होता है, लिखे-बोले को समझना होता है, कहने वाले की मंशा भी भांपनी होती है। दिखाने-बताने के पीछे कोई दर्शन भी है या सिर्फ प्रदर्शन, इसकी पड़ताल करनी होती है।

 

नाम के कलमकार ने कहा- हुजूर इस सबकी क्या जरूरत है। इसमें समय भी जाया होता है दिमाग भी खर्चता है और अपना ही नुकसान भी है। समझदार कलमकार ने कहा कि ऐसा करना ही क्यों है, जिसमें काम ज्यादा दाम कम हो। हमारा फलस्फा तो साफ है- देने वाले से दोस्ती न देने वाले से बैर। वो जमाना अलग था, जब कहा जाता था- न काहूं से दोस्ती न काहूं से बैर। हम तो नए जमाने के है। मॉर्डन भी है और मॉडल तो खैर पिछले कुछ वर्षो से हो ही गए हैं। तो हम वहीं करेंगे, जो आज का दौर करेगा, आज की ताकत की आवाज कहेगी।

हमें क्या फर्क पड़ता, जो हम सही-गलत या सच-झूठ के फेर में पड़े। कोई हम ही थोड़ी हैं हंस। वैसे भी हममें कौन सा नीर क्षीर विवेक है? जो हम इन झमेलों में पड़े। हमारी राह सीधी है सरल है, इसमें कोई उतार-चढ़ाव नहीं। तभी तो हम सबको एक ही तराजू में तौलते हैं। इसमें क्या सही क्या गलत?

देखो, हमसे जिसने कहा रात है, भले ही भरी दुपहर में उसने कहा, लेकिन हमने रात ही माना! हमने कभी सवाल नहीं किया, कभी जवाब नहीं मांगा। हमारी कलम वही देखती है और लिखती है, जो हमसे देखने व लिखने को कहां जाता है। हम ताकतवार के आगे भीगी बिल्ली हैं, तो कमजोरों को चूहा मानते हैं। दरसल हम कलमकार से ज्यादा कलम के ठेकेदार हैं। तभी तो जिसने हमसे जैसा कहा, हम लिख देते हैं, हम बोल देते हैं, शर्त बस एक है कहने-बोलने वाला ताकतवर होना चाहिए। एक ही लक्ष्य है खुद बेसुध रहो और किसी को सुध लेने भी न हो। दरसल ये दर्शन आज के ढेरों कलमकारों के लिए कमाल का हैं। विश्वास न हो, तो किसी भी खबर को पढ़ लो या देख लो, प्रिंट की हो, पोर्टल की या बुद्धबक्शे की, सबकी लाइन एक, रत्तीभर भी फर्क नहीं! उनके ऐसा कहने पर समझ आया कि कलम क्यों कीचड़ के दलदल में धंसी है।




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