Monday Aug 24, 2026

पिरूल से ऊर्जा और रोजगार का मॉडल देखने पहुंचे अरुणाचल प्रदेश स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. टागे टाकी

देवभूमि टुडे

चंपावत/भिंगराड़ा। चंपावत जिले के भिंगराड़ा में पिरूल को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन में बदलने की पहल अब दूसरे राज्यों का ध्यान भी आकर्षित कर रही है। भिंगराड़ा में स्थापित पाइन नीडल ब्रिकेटिंग प्लांट का हाल ही में अरुणाचल प्रदेश स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. टागे टाकी और टागे तागयो ने दौरा किया।

यह परियोजना उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकोस्ट) द्वारा वित्त पोषित तथा सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून द्वारा स्थापित की गई है। दौरे के दौरान डॉ. टागे टाकी ने प्लांट की कार्यप्रणाली, पाइन नीडल से ब्रिकेट निर्माण की प्रक्रिया तथा इसके पर्यावरणीय एवं आर्थिक लाभों की जानकारी ली।

यूनिट का मुआयना करतें अरुणाचल प्रदेश स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. टागे टाकी और टागे तागयो।

महिलाओं ने संभाली कमान, बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल:

डॉ. टागे टाकी ने इस बात की खासतौर पर सराहना की कि इतने दूरस्थ पर्वतीय गांव भिंगराड़ा में इस यूनिट की कमान स्थानीय महिलाओं ने संभाल रखी है। समूह की महिलाएं स्वयं प्लांट के संचालन से लेकर पिरूल के संग्रह और ब्रिकेट निर्माण तक की जिम्मेदारी निभा रही हैं।

उन्होंने महिलाओं की इस पहल को प्रेरणादायक बताते हुए कहा कि भिंगराड़ा की महिलाओं ने यह साबित किया है कि यदि अवसर, तकनीक और सहयोग मिले, तो ग्रामीण महिलाएं न केवल अपने गांव में रोजगार का सृजन कर सकती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि भिंगराड़ा की महिलाएं अन्य ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस मॉडल से प्रेरणा लेकर अन्य क्षेत्रों की महिलाएं भी स्थानीय संसाधनों पर आधारित ऐसे उद्यमों को अपनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेंगी।

छोटे गांव से निकला बड़ा मॉडल:

अरुणाचल प्रदेश में भी पाइन नीडल जैसे वन-आधारित बायोमास से ऊर्जा उत्पादन एवं रोजगार सृजन की संभावनाओं पर डॉ. टागे टाकी ने चर्चा की। उन्होंने कहा कि भिंगराड़ा के इस मॉडल को अरुणाचल प्रदेश में भी अपनाने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे।

भिंगराड़ा में विकसित यह पहल अब केवल एक गांव की परियोजना नहीं रह गई है, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में पिरूल प्रबंधन, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक प्रभावी मॉडल बनती जा रही है। दूसरे राज्य के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रतिनिधि द्वारा यहां पहुंचकर इस मॉडल का अध्ययन करना ग्रामीणों, यूकोस्ट तथा सीएसआईआर (भारतीय पेट्रोलियम संस्थान) के लिए गौरव की बात है।

पिरूल से जंगलों में लगने वाली आग के खतरे को कम करने के साथ-साथ इसके वैज्ञानिक उपयोग से स्थानीय रोजगार, स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण आय के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। भिंगराड़ा की यह पहल एक सकारात्मक संदेश दे रही है। पहाड़ की जिस पिरूल को कभी समस्या समझा जाता था, वही आज महिलाओं के हाथों में रोजगार, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का साधन बन रही है।




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