2013 से फल-फूलों से खेली जा रही देवीधुरा की बगवाल
आस्था के धाम देवीधुरा में 15 मिनट की हैरतंगेज बगवाल को आंखों में कैद करेंगे हजारों लोग
देवभूमि टुडे
चंपावत/देवीधुरा। मां वाराही धाम के खोलीखांड मैदान में बमुश्किल 15 मिनट की बगवाल और हजारों लोगों का समागम। चार खाम और सात थोक अलग-अलग रंग के साफे। सब कुछ हैरंतगेंज और स्तब्ध करने वाला। विस्मयकारी बगवाल के साक्षी बनने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से ही नहीं, बल्कि सरहद से बाहर के लोग भी कई बार मां बारही धाम तक पहुंचते हैं। विज्ञान और तकनीक की पताका चंद्रमा तक पहुंचाने के बावजूद 21वीं सदी में बगवाल की इस अदभुत परंपरा को आंखों में कैद करने का मोह आस्था की ताकत को दर्शाता है।
पीठाचार्य पंडित कीर्ति बल्लभ जोशी का कहना है कि फल-फूलों से चार खाम और सात थोकों के बीच खेली जाने वाली यह बगवाल देखने वालों के लिए भी फलदाई मानी जाती है। उनका कहना है कि मां बाराही देवी धाम में होने वाली बगवाल आधुनिक दौर में आस्था की ताकत बताती है। देवी को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद लेने के लिए बगवाल खेली जाती है। परंपरा के इस महापर्व में देवी मां हर साल स्वत: ही नूतन स्वरूप लाती है।
12 क्विंटल से अधिक फलों से खेली जाएगी बगवाल:
बगवाल 12 क्विंटल से अधिक फलों से खेली जाएगी। मुख्य रूप से नाशपाती और छुटपुट रूप से सेब से बगवाल खेली जाएगी। दोनों ही फलों की पैदावार
देवीधुरा और आसपास खूब होती है। फल और फूूलों का प्रबंध मंदिर समिति के अलावा श्रद्धालु करते हैं।

बगवाल खेलने वाले खाम और गांव:
लमगडिय़ा खाम: कोटला, सूफी, बेड़चुला, मथेलाछाना, दाड़मि, नरती बेतन, सिलपड़ और वारी का आधा गांव।
गहड़वाल ख़ाम: ढरोज, कोट भैसर्ख, तिमला, कटौली, खैरनी, दर्दोली, गंवाई, अनर्पा, बिरोली, चमतोल, मोलना, बनोली, कुम्यया कुड़ा, इजट्टा।
वालिग खाम: वालिग, कलना, दुंठी, मंगललेख, तल्ला कांडा, पजेना, वालिक खाम के मददगार आठ कोटा आगर और नौ लक्खा सूपी और जान, डसली, भेटी, दियारखोली, सेमलकन्या और वारी का आधा गांव।
चम्याल खाम: पखोटी, कनवाड़, देवाल, मल्ला कांडा, पारस, बटुलिया, बजान, सिंघवाल।
बगवाल में हुए प्रमुख बदलाव:
2012 तक पत्थरों से खेली जाती थी बगवाल।
2013 से फल-फूलों से खेली जाने लगी बगवाल।
2020 में कोरोना की वजह से बगवाल के इतिहास में पहली बार मेले का आयोजन नहीं हुआ, सिर्फ सांकेतिक रूप से बगवाल खेली गई।
2021 में भी कोरोना की मार पड़ी और बगवाल प्रतीकात्मक रूप से खेली गई।
2022 में बगवाल को विभागीय मेले का दर्जां मिला।
2023 में बगवाल राजकीय मेला बना।
मां की महिमा...का किया है आईआरएएस अफसर ने बखान:
मां वाराही देवी धाम की महिमा अपरंपार है। मां की महिमा पर इसी साल जून में एक पुस्तक भी लिखी गई है। आईआरएएस (भारतीय रेल लेखा सर्विस) अधिकारी हीरा बल्लभ जोशी ने 126 पेज की इस पुस्तक में मां बाराही देवी के दिव्य रूपों के अलावा देवीधुरा के धार्मिक, पौराणिक और एतिहासिक महत्व का बखान किया है।
नरबलि का विकल्प है बगवाल:
बगवाल की परंपरा नरबलि को रोकने का जरिया रही है। कहते हैं कि कभी यहां नरबलि दिए जाने का रिवाज था, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के इकलौते पौत्र की बलि की बारी आई तो वंशनाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की। देवी मां केप्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार ली। तभी से बगवाल जारी है।
अंग्रेज कमिश्रर ट्रेल के आतंक से अधिकांश जगहों पर बंद हुई बगवाल:
अब भले ही बगवाल अकेले बाराही धाम में ही होती है लेकिन कभी उत्तराखंड में ही 20 जगह बगवाल खेलने का रिवाज था। इनमें से अधिकांश ब्रिटिश हुकमरानों की कार्रवाई से बाद में बंद हो गई। 1816 से 1835 तक कुमाऊं कमिश्नर रहे जाजज़् विलियम ट्रेल ने बगवाल खेलने वालों के खिलाफ धरपकड़ की थी। ट्रेल की इस कारवाई से देवीधुरा छोड़ अन्य जगह बगवाल बंद हो गई। इतिहासकार डॉ. मदन चंद्र भट्ट बताते हैं कि पूर्व में बगवाल कई जगह होती थी लेकिन बगवाल का स्वरूप सब जगह एक जैसा नहीं था। बगवाल का इस्तेमाल सैन्य परीक्षण के लिए भी होता रहा है।
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