Tuesday Mar 3, 2026

बातों-बातों में:-

सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का पर्व होली

भगवत प्रसाद पाण्डेय

पैतृक संपत्ति की तरह विरासत में मिलने वाली संस्कृति को सहेजना और आगे बढ़ाना संतानों का नैतिक दायित्व है। इसी भावना से हमारे पर्व-त्योहार पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित और समृद्ध बने हुए हैं। विरासत में मिले कुछ ऐसे पर्व होते हैं, जिन्हें  सब लोगों द्वारा मिल-बैठ कर मनाए जाने का अटूट सिलसिला भारतीय समाज में कायम हैं। सामाजिक पर्वों में होली की खास जगह है।

होली ऐसे समय मनाई जाती है, जब फाल्गुन के महीने में ठंड विदा लेती है तथा गर्मी का एहसास होने लगता है। मैदान और पहाड़ दोनों जगह खेतों में वसंती फूलों की बहार नजऱ आती है। हरियाली छाने लगती है और फूल-कलियां खिल उठती हैं। ऐसे में पशु-पक्षी आनंदित होने लगते हैं। मनुष्य भी प्राकृतिक रंगों के साथ अपने तन-मन को भिगोने के लिए तैयार रहता है। पर्व-उत्सवों की परंपरा के पीछे कुछ न कुछ आधार होते हैं। होली मनाने के भी कई कारण हैं। वैदिक काल से ही होली को वैदिक यज्ञ की संज्ञा दी गई। नई फसल के अनाज का जो अनुष्ठान नवानन्नेष्टि (नवान्न यज्ञ) होता है, उसके अन्न प्रसाद को 'होला' कहते हैं। यहीं से होली की शुरूआत बताई जाती है।

कालांतर में इस पर्व के साथ भक्त प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की बहिन होलिका की कथा का प्रसंग जुड़ गया। भगवान महादेव के द्वारा क्रोधाग्रि से कामदेव को भस्म किए जाने का कथानक भी कुछ लोग होली से जोड़ते हैं। स्पष्ट है कि कोई भी अच्छा आयोजन धीरे-धीरे ही विस्तार लेता है। भारतीय सनातन संस्कृति की अनुगमन करने वाली उत्तराखंड की सभ्यता में होली को विस्मृत नहीं किया जा सकता है। इतना अवश्य है कि देश काल परिस्थितियों के अनुसार उसे मनाये जाने का तौर-तरीका बदल सकता है। कूर्मांचल में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी से दंपती टीका (द्वितीया) तक होली पूरे सप्ताह चलती है। 

यदि कालीकुमाऊं (जिला चंपावत) की होली की बात की जाए, तो यहाँ की होली बड़ी प्रसिद्ध है। कुमाऊँ में चंद वंश का शासन चंपावत से ही शुरू हुआ। चंद शासक भी संस्कृति को बढ़ावा देने की सोच रखते थे। चंद राजाओं के साथ मथुरा, काशी आदि जगहों से आये हुए विद्वान लोग यहीं बस गए। इसलिये मथुरा की होली तथा ब्रज की बोली का प्रभाव कुमय्यां होली गायन में सुनाई और दिखाई देता है।

चंपावत चाराल की खड़ी होली राजमहल राजबुंगा किले (वर्तमान तहसील कार्यालय) में चौबे होली के रूप में कुछ वर्ष पहले तक आयोजित होती रही। काली कुमाऊँ में खड़ी तथा बैठकी होली के दोनों रूप प्रचलित हैं। क्षेत्र के होली रसिकों द्वारा संकलित होली गीतों की संख्या भी सैंकड़ों में हैं। खड़ी होलियों में देवी-देवताओं की स्तुति, धर्म-ग्रंथों के कथानक, राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाएं, राम-रावण और कौरव-पांडव युद्ध तथा अन्य पौराणिक बातों का सार होता है। खड़ी होली प्राय: दिन में ढोल, झांझ-मजीरे के साथ होल्यारों द्वारा गोलाकार पंक्ति बनाकर गाई जाती है। प्राय: एक होली गायन में एक-डेढ़ घंटा लगता है। इसमें होली के बोल और ढोल की आवाज के साथ होल्यारों के चेहरे हाथों का हाव-भाव, कदमों की लय-ताल आदि जब सभी बातों का समन्वय होता है। बैठकी होली में हारमोनियम, तबला, ढोलक आदि वाद्य यंत्रों  के साथ शास्त्रीय धुनों पर आधारित राग-रागनियां गाई जाती हैं। यहाँ बैठकी होली पौष के पहले रविवार से ही शुरू हो जाती है फिर वसंत पंचमी, शिवरात्रि से लेकर होली के समापन तक मिल-बैठ कर राग-फाग की महफिल चलती ही रहती हैं। पंचांग देख कर एकादशी के दिन जब भद्रा न हो तब होली का रंग छिड़क कर पर्व का शुभारंभ होता है। इसी दिन चीर बंधन के साथ प्रत्येक गाँव, कस्बे में इष्टदेव के मंदिर या अन्य मुख्य मठ-मंदिरों के प्रांगण में होली के फगुवा देव स्तुति की खड़ी होलियां गाई जाती है।

-तुम सिद्धि करो महाराज होली के दिन में, तुम विघ्न हरो गणराज होली के दिन में, -खेलत गोपी ग्वालबाल रे मथुरा से होली आई, को गावे को नचावे कौन बजावे ढोल श्याम रे- तथा -हरिया पीपल पात, लाल ध्वजा फहरानी, देवी काँ तेरो थान, कां आली देवी भवानी- जैसी होलियों से गायन का श्रीगणेश होता हैं। 

द्वादशी व त्रियोदशी को होल्यारों द्वारा भगवान की लीलाओं के प्रसंग वाली वेदांती होलियां गायी जाती हैं। जिनमें -कुंडलपुर के राजा भीष्मक नाम कहाय, ता घर जन्मी कन्या रुक्मणि नाम कहाय-, -दधि मथे यशोदा माई कदम तल झूलो कन्हैय्या पालाने-,  -चंपा के नौ-दस फूल मालिनी हार गूंथो है- तथा  -करी तपस्या घोर कुॅंवर भागीरथ गंगा ले आये- आदि कर्णप्रिय हैं। 

चतुर्दशी और पूर्णिमा को जब होली अपने पूर्ण यौवन पर आ जाती है, तब श्रृंगार रस से भरपूर रसीली होली गीत सुनाई देते हैं। इनमें  -कहाँ के तुम ग्वालिन माधो बंजारिन कहाँ दधि बेचन जाय रे मोहन लाल-, -वृन्दावन मोहन दधि लूटो-, -क्यों ठाडी दिलगीर राधिका-, -कहो तो यहीं रम जाएं, गोरी नैना तुम्हारे रस भरे- और  -ओ झुकि ओ मोरे यार जालिम नैना तोरे, बारह पाट को लहंगा पहने यौवन देत बहाय- खास हैं। होलिका दहन के बाद प्रतिपदा को छरड़ी के दिन होली का रंग जब अपने चरम पर पहुँच जाता है तब प्रात: से ही रंगों से भीगते-भिगाते  मस्त होल्यारों की टोलियां घर-घर जाकर होली गाते हुए रंगों से खेलते है और हर घर-आंगन में होली की आशीष देते हुए कई होली गाते हैं।

होली की विदाई का दिन दंपति टीके यानी द्वितीया होता है। एक बार फिर देवी-देवताओं की स्तुति वाली होलियां गाते हुए सबसे अंत में -कुंवर भरत के साथ हरि मथुरा को गए- होली को विदा लेती है। इसी दिन पूजा-पाठ के बाद हलुवे (अन्न प्रसाद 'होला' का प्रतीक) का प्रसाद बाँटा जाता है।

उक्त प्रचलित होलियों के अतिरिक्त महिलाओं को कुछ अन्य होलियां ज्यादा भाती हैं, उन्हें वह गाती हैं।होलियों में खास तौर पर पहनी जाने वाली होली वाली धोतियाँ पहने कुमाउँनी महिलाएं  खड़ी और बैठकी होली में बेफुर्सत दिखती हैं। खड़ी होली के दौरान कभी-कभी झोड़े भी गाये जाते हैं। झोड़ा का मतलब तेज लय झटके के साथ नृत्य-गान है। लोकप्रिय झोड़ों में -चूड़ी छम चूड़ी छम बजला नेवर, सबौ है लाडीला कांसा देवर- है। इसमें -झनकारो-झनकारो गोरी प्यप्यारो लागो तेरो झनकारो- प्रसिद्ध झोड़ा है, जिसके कुछ बोल हिंदी फिल्म क्रांतिवीर के एक गीत में भी सम्मिलित लिए हैं। बैठकी होली में राग-रागनियां शास्त्रीय संगीत की तर्ज में गाए जाते हैं। कुछ प्रसिद्ध बैठकी होली के रागों में -ऊँचे भवन पर्वत बस रही-, -प्यारी चमकत हो सावन की चपला सी-,  -बहुत दिनन के रूठे पिया को मनाऊंगी- प्रसिद्ध है।

यहाँ एक बात उल्लेखनीय है, वह यह कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव और रोजगार की कमी से उत्तराखण्ड के गाँवों में आज पलायन एक गम्भीर समस्या के रूप में उभर चुकी है। कई गांव वीरान हो गए हैं। ऐसे में प्रवासी उत्तराखण्डी अन्य किसी त्यौहार पर अपने घर-गाँव आये या न आये लेकिन होली में यहाँ के लोग 'बलमा घर आयो फागुन में 'गुनगुनाते हुए घर आते ही हैं। विगत 14 वर्ष से श्री राम सेवा सांस्कृतिक रामलीला कमेटी लोहाघाट होली से कुछ दिन पहले 'रंग महोत्सव' का आयोजन करती है। इसमें विभिन्न गाँवों के महिला-पुरुष होल्यार प्रस्तुति देते हैं। यह महोत्सव अब तक राज्य और देश में काफी सुर्खियां बटोर चुका है। इस साल से कलश संगीत कला समिति, चंपावत ने जिला मुख्यालय में भी यह महोत्सव शुरू किया है। साथ ही 20 गाँव, बिशुंग भी एक दिवसीय रंग महोत्सव का आयोजन किया जा चुका है। इस तरह काली कुमाऊं की संस्कृति प्रेमी जनता वर्षों से जारी होली की  परंपरा को बचाये हुए हैं। यह बात पहाड़ की संस्कृति के हित में अच्छा है।

निवासी-पाटन पाटनी, लोहाघाट।

(लेखक सेवानिवृत्त अधिकारी होने के अलावा साहित्यकार भी हैं)




Share on Facebook Share on WhatsApp

© 2026. All Rights Reserved.