भूपेंद्र सिंह देव ताऊजी* (उत्तराखंड राज्य की व्यवस्था के नाम खुला पत्र)
2 अक्टूबर 1994 से आज 2 अक्टूबर 2026 तक 32 वर्ष पूरे हो चुके हैं। जबकि उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था, इसलिए “राज्य निर्माण के 26 वर्ष” और “रामपुर तिराहा के 32 वर्ष”अलग-अलग संदर्भ हैं।
शहादत के 32 साल, फिर भी न्याय की तलाश:
जिस आंदोलन ने उत्तराखंड दिया, उसी आंदोलन के सिपाही आज अपने हक-हकूक के लिए व्यवस्था के सामने क्यों बेबस हैं? आखिर कब तक 2 अक्टूबर 1994...कैलेंडर पर यह तारीख हर वर्ष आती है, लेकिन उत्तराखंड के लिए यह सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है, जब पहाड़ के सीने पर ऐसा घाव हुआ, जिसकी टीस आज भी महसूस की जाती है। यह वह दिन था, जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर रोका गया और पुलिस कार्रवाई में कई आंदोलनकारी शहीद हो गए तथा आंदोलनकारी महिलाओं के साथ गंभीर अपराधों के आरोप सामने आए।
उस रात पहाड़ से निकली बसों में केवल लोग नहीं थे, बल्कि उनमें एक सपने का सफर था। वह सपना था उत्तराखंड राज्य का। लोग अपने घर-परिवार छोड़कर निकले थे। किसी के हाथ में पत्थर नहीं था, किसी के मन में हिंसा नहीं थी। उनके पास था तो केवल अपने पहाड़ का सपना और अलग राज्य की मांग लेकिन रामपुर तिराहा ने उस सपने को खूनी रंग से रंग दिया।
आज 32 वर्ष बाद भी रामपुर तिराहा का सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। न्यायिक प्रक्रिया में कुछ मामलों में फैसले आए हैं। मार्च 2024 में एक मामले में दो पूर्व पीएसी कर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी और जुलाई 2026 में फर्जी हथियार बरामदगी से जुड़े 32 साल पुराने मामले में तीन पूर्व पुलिस कर्मियों को डेढ़-डेढ़ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। फिर भी रामपुर तिराहा से जुड़े सभी पीड़ितों और मामलों के संदर्भ में न्याय की पूर्णता का प्रश्न आज भी बना हुआ है। यही तो इस त्रासदी की सबसे बड़ी विडंबना है कि जिस न्याय के लिए एक पीढ़ी ने संघर्ष किया, उसी न्याय की तलाश अगली पीढ़ी तक क्यों पहुंच गई? राज्य बन गया, लेकिन क्या आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड राज्य भी बना?
शहीदों के परिवारों ने, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी साथियों ने सोचा होगा कि अब उनके बलिदान, त्याग, तपस्या का सम्मान होगा। आंदोलनकारियों ने सोचा होगा कि अब व्यवस्था उनके दर्द को समझेगी। पहाड़ ने सोचा होगा कि अब उसके संघर्ष का फल मिलेगा। लेकिन आज 26 वर्ष के राज्य के सामने एक दूसरा सवाल खड़ा है कि-क्या हमने केवल राज्य की भौगोलिक सीमा हासिल की है, या वह व्यवस्था भी बनाई है जिसके लिए यह आंदोलन लड़ा गया था? क्या आज भी प्रदेश को स्थाई राजधानी मिल पाई?
आज भी राज्य आंदोलनकारी अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सरकार और शासन के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। चिन्हीकरण से लेकर पेंशन, क्षैतिज आरक्षण और आश्रित प्रमाण पत्र तक अनेक विषय लगातार चर्चा और संघर्ष का हिस्सा बने हुए हैं, क्या उनकों न्याय मिल पाया?
अगस्त 2026 में राजधानी देहरादून में एक विशाल सभा हुई। जिसमें राज्य आंदोलनकारी साथी 4 कैबिनेट मंत्री, 3 उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी कल्याण एवं सम्मान परिषद के तीनों दर्जा मंत्री और और विधायक गण शामिल हुए। उनके सम्मुख वृद्ध असहाय साथियों ने प्रदेश के दूरस्थ जिलों से जाकर प्रतिभाग किया और अपनी-अपनी पीड़ाएं मंच के माध्यम से माननीयों के समक्ष रखी। उस पर अभी तक कोई चर्चा-परिचर्चा तक नहीं हो रही है। क्या होगा? सितंबर 2026 में चंपावत में राज्य आंदोलनकारियों की समस्याओं पर हुई बैठक में भी सम्मान, पेंशन, चिन्हीकरण, आरक्षण और सेवारत राज्य आंदोलनकारी आश्रित प्रमाण पत्र जैसे विषय उठे थे। वंचित राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण की मांग अभी भी समाप्त नहीं हुई है। अगस्त 2026 में खटीमा में आंदोलनकारियों ने वंचित आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण और पेंशन वृद्धि की मांग उठाई। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस राज्य की नींव आंदोलनकारियों के संघर्ष पर रखी गई, उसी राज्य में आंदोलनकारी आज अपने अधिकारों के लिए बार-बार आवेदन, ज्ञापन, बैठक और आंदोलन करने को क्यों मजबूर है?
एक प्रमाण पत्र और एक परिवार का भविष्य:
सबसे अधिक पीड़ा उस समय होती है, जब संघर्ष किसी बड़े बजट या किसी बड़ी योजना के लिए नहीं, बल्कि एक प्रमाण पत्र के लिए करना पड़े। राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों के लिए सरकारी सेवाओं में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था का रास्ता खुला, लेकिन आश्रित प्रमाण पत्र जारी होने में आ रही अड़चनों ने अनेक परिवारों को परेशान किया। नवंबर 2024 में प्रकाशित रिपोर्ट में भी यह समस्या सामने आई थी कि एक्ट बनने के बाद आश्रित प्रमाण पत्र जारी नहीं हो पा रहे थे और इसके कारण आश्रित सरकारी सेवाओं में आवेदन के लाभ से वंचित हो रहे थे।
2025 में भी राज्य आंदोलनकारी संगठनों को अधीनस्थ चयन आयोग के सामने आश्रित प्रमाण पत्रों से जुड़ी समस्याएं उठानी पड़ीं। और 2026 में भी प्रमाण पत्र और भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आया। मार्च 2026 में उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच ने आरोप लगाया कि प्रमाण पत्र संबंधी नियमों और प्रक्रिया के कारण कुछ आश्रितों के परीक्षा परिणाम प्रभावित हुए।
यहां मेरा सवाल व्यवस्था से है। सेवारत राज्य आंदोलनकारी साथियों को उनके आश्रितों को अपने अधिकार का प्रमाणपत्र पाने के लिए भी संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? क्या उनके पिता या माता उस आंदोलन में शामिल नहीं थे? क्या उन्होंने उत्तराखंड के लिए संघर्ष नहीं किया? क्या उन्होंने लाठियां, मुकदमे, जेल और दमन नहीं झेला? यदि एक आंदोलनकारी ने अपना जीवन इस प्रदेश के निर्माण के संघर्ष में लगा दिया, तो उसके आश्रित के हाथ में एक प्रमाण पत्र पहुंचाने में व्यवस्था इतनी असहाय क्यों हो जाती है?
आज स्थिति ऐसी है कि कोई युवा प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने के बाद भी केवल इसलिए अपने हक से वंचित होने की आशंका में खड़ा हो जाता है, क्योंकि उसके पास निर्धारित आश्रित प्रमाण पत्र नहीं है। सोचिए उस परिवार की मनःस्थिति क्या होगी? एक ओर वर्षों की मेहनत के बार परीक्षा में सफलता मगर दूसरी ओर व्यवस्था का एक कागज “प्रमाण पत्र प्रस्तुत कीजिए।” और जब वही प्रमाण पत्र शासन-प्रशासन की प्रक्रिया में अटका हो तो...? यह केवल नौकरी का सवाल नहीं है, उस परिवार के सम्मान का भी सवाल है, जिसने उत्तराखंड निर्माण में अपना योगदान दिया।
अब हम सब की निगाहें 4 अक्टूबर 2026 पर टिकी हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र चंपावत के बनबसा में पहली बार मंत्रिमंडल की बैठक प्रस्तावित है। यह बैठक सामान्य प्रशासनिक बैठक होगी? या आंदोलनकारियों के लिए किसी उम्मीद का दरवाजा खोलेगी? लेकिन आज राज्य आंदोलनकारी समाज की आंखें इस बैठक की ओर हैं। क्या इस कैबिनेट बैठक में उन मुद्दों पर निर्णय होगा, जिनके लिए आंदोलनकारी वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं? क्या सेवारत राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों के प्रमाण पत्र का विषय निर्णायक रूप से हल होगा? क्या क्षैतिज आरक्षण का लाभ वास्तविक पात्रों तक बिना अनावश्यक प्रशासनिक अड़चन के पहुंचेगा? क्या वंचित राज्य आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण समयबद्ध तरीके से पूरा होगा? क्या बार-बार बनने वाली समितियों, बैठकों और आश्वासनों के बजाय अब कोई स्पष्ट समयसीमा तय होगी?
और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 4 अक्टूबर की कैबिनेट बैठक उत्तराखंड के आंदोलनकारियों के लिए केवल एक और तारीख बनेगी, या किसी ठोस न्यायपूर्ण निर्णय की शुरुआत करेगी? यह सवाल उस इतिहास से है, जिसे हम हर वर्ष 2 अक्टूबर को श्रद्धांजलि देकर याद करते हैं। श्रद्धांजलि केवल पुष्पांजलि से पूरी नहीं होती। हर वर्ष की तरह आज भी रामपुर तिराहा के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। फूल चढ़ाए गए। भाषण भी हुए। शहादत को याद किया गया। लेकिन क्या शहीदों की सच्ची श्रद्धांजलि केवल स्मारकों और समारोहों तक सीमित रहनी चाहिए? यदि किसी आंदोलनकारी का परिवार आज भी अपने अधिकार के लिए दर-दर भटक रहा है, तो हमें अपने आप से पूछना होगा- हमने शहीदों की विरासत को कितना समझा? रामपुर तिराहा की शहादत हमें केवल अतीत की याद नहीं दिलाती। वह हमें वर्तमान के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी याद दिलाती है। शहीदों ने उत्तराखंड मांगा था। उन्होंने शायद यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन उत्तराखंड बन जाने के बाद भी उनके अपने साथी अपने अधिकारों के लिए सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां चढ़ेंगे। मुख्यमंत्री, तमाम मंत्री और विधायक गण। कई विधायकों के अलावा कई मंत्री आंदोलनकरी भी हैं।
कैबिनेट की बैठक सिर्फ प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, हजारों आंदोलनकारी परिवारों के लिए यह उम्मीद की एक तारीख भी है। इसलिए आज वे केवल यह पूछ रहे हैं कि जो अधिकार घोषित किए गए हैं, वे पात्र लोगों तक कब पहुंचेंगे? जो प्रमाण पत्र बनने चाहिए, वे कब बनेंगे? जो वंचित आंदोलनकारी वर्षों से चिन्हीकरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनकी प्रतीक्षा कब समाप्त होगी? जो आश्रित भर्ती की दहलीज पर खड़े हैं, उन्हें कागजों की कमी के कारण वापस कब तक लौटना पड़ेगा? और अंततः आखिर कब तक? कब तक आंदोलनकारी अपने ही राज्य में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे? कब तक आश्रित एक प्रमाण पत्र के लिए व्यवस्था की ओर देखते रहेंगे? कब तक शहीदों की तस्वीरों पर माल्यार्पण होगा और उनके सपनों के उत्तराखंड के लिए अगली तारीख दी जाती रहेगी? रामपुर तिराहा की चीख आज भी पूछ रही है...
32 वर्ष पहले रामपुर तिराहा पर गोलियों की आवाज ने पहाड़ को झकझोर दिया था। आज गोली की आवाज नहीं है। आज सत्ता के गलियारों में दम तोड़ती आवाज है तो, किसी आंदोलनकारी के आवेदन की। किसी आश्रित की पुकार की। किसी बेरोजगार युवा की चिंता की। किसी वृद्ध आंदोलनकारी की आंखों में जमा प्रतीक्षा की। किसी उस परिवार की पीड़ा की, जिसने कहा- “हमने उत्तराखंड के लिए दिया था, अब अपने बच्चों के भविष्य के लिए न्याय मांग रहे हैं।”
रामपुर तिराहा की शहादत को 32 वर्ष हो गए। उत्तराखंड बने भी 26 वर्ष होने को हैं। इतना लंबा समय किसी व्यवस्था के लिए बहुत होता है। इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं कि न्याय मिलेगा या नहीं। सवाल यह है कि न्याय आखिर कब मिलेगा? आज 2 अक्टूबर को जब हम रामपुर तिराहा के शहीदों को याद कर रहे हैं, तो केवल उनकी तस्वीर पर फूल न चढ़ाएं। एक बार उन परिवारों की ओर भी देख लें, जो आज भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं। क्योंकि आज हमारा उत्तराखंड केवल पहाड़, नदियां और सीमाएं नहीं है। आज का हमारा उत्तराखंड उन लोगों की कुर्बानी, त्याग तपस्या का नाम है, जिन्होंने इसके लिए अपना आज कुर्बान किया था। और उन कुर्बानियों का सम्मान तभी पूरा होगा, जब इस राज्य में आंदोलनकारी और उनके आश्रित अपने अधिकारों के लिए बेबस नहीं, बल्कि सम्मान के साथ खड़े दिखाई देंगे। रामपुर तिराहा की शहादत को नमन, खटीमा, मंसूरी, नैनीताल में हुए शहीदों सहित सभी राज्य आंदोलनकारियों को नमन। और उस न्याय की प्रतीक्षा, जो अब और लंबी नहीं होनी चाहिए।
जय भारत जय उत्तराखंड।
लेखक चंपावत जिले के निवासी और उतराखंड आंदोलनकारी हैं।
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