दीप जले जब मन-उपवन में, तो दीवाली।
संगीत झरे जब पावन तन में, तो दीवाली।
प्रेम का दीपक स्नेह की बाती हो जिसमें समरसता का तेल।
फोड़े पटाखे काम-क्रोध के होवे मन से मन का मेल।
प्रेम ही प्रेम हो जब जीवन में तो दीवाली।
बन एकता की दीपमालिका मिल जायें आओ! हम।
खिले-खिले खीलों के जैसे आज खिल जायें आओ! हम।
खिलौनों से सीखें आओ! तोड़े जाने पर भी मिष्ठ ही रहना।
मीठे बतासे हमें बतायें सदैव अन्दर से तुम शिष्ट ही रहना।
बारूद के बदले शूल जब महके सुमन-सुगन्ध पवन में तो दीवाली।

...जनकवि शूल क्वेरालाघाटी
सदस्य किशोर न्याय बोर्ड, चंपावत।
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