Monday Apr 20, 2026

कोयल जब गाये तो बसंत है, सरसों जब लहराये तो बसंत है। 

बिरह व्यथा में गीत मिलन के, नवयौवन जब गाये तो बसंत है। 

श्वेत हिम की चादर त्याग धरा जब, पीतवसनी बन जाये तो बसंत है। 

कंत किसी का बिछड़ा जब, वापस घर आ जाये तो बसंत है। 

नव यौवना तरुणि जिस दिन, खुद पर ही इतराये तो बसंत है। 

शूलमय दु:ख की निशा खत्म जब, सुख प्रभात आ जाये तो बसंत है। 

जनकवि प्रकाश जोशी शूल, क्वेरालाघाटी चंपावत।




Share on Facebook Share on WhatsApp

© 2026. All Rights Reserved.